07/01/2015

पुरुष यौनता की कठिनाईयाँ

अक्सर लोग, विषेशकर युवा, मुझसे ईमेल के माध्यम से स्वप्नदोष या शीघ्रपतन के बारे में सलाह माँगते हैं, कि क्या करना चाहिये. किशोरों तथा युवाओं के मन में इस तरह की चिन्ताएँ उठना कुछ हद तक स्वाभाविक है, क्योंकि इस विषय पर अन्य लोगों से बात करना या सलाह माँगना आसान नहीं है.

आज की पोस्ट में इसी विषय में बात करना चाहता हूँ - यानि, पुरुष यौन अंग कौन से होते हैं, किस तरह काम करते हैं और शीघ्रपतन तथा स्वप्नदोष क्या होते हैं.

Male sexuality graphic by Sunil Deepak, 2014

भारत में पुरुष यौनता से जुड़े पाराम्परिक विश्वास

भारत के पाराम्परिक विश्वास में पुरुष वीर्य को बहुत महत्व दिया गया है. कहते हैं कि वीर्य की एक बूँद कई लाख खून के कणों से बनती है. इसलिए वीर्य पतन के साथ शारारिक कमज़ोरी को जोड़ा गया है और नवयुवाओं को ब्रह्मचर्य पालन यानि वीर्य को सम्भाल कर रखने की सलाह दी जाती है.

इस वजह से हस्तमैथुन को गलत माना जाता है और यह सोच बनती है कि हस्तमैथुन करने वाले नवयुवक धीरे धीरे सामान्य सम्भोग की शक्ति खो बैठते हैं जिसकी वजह से वह यौनक्रिया के काबिल नहीं रहते और उनमें शीघ्रपतन या स्वप्नदोष जैसी "बीमारियाँ" उभर आती हैं. इस मानसिक सोच से जुड़े डरों के के आसपास बहुत से हकीम-वैद्य-डाक्टरों के कारोबार टिके हैं जो इस डर का फायदा उठाते हैं.

पुरुष यौनता और भूमण्डलीकरण

जहाँ एक ओर पाराम्परिक सोच वीर्य को सम्भालने की बात करती है तथा हस्तमैथुन, स्वप्नदोष आदि को बीमारियाँ मानती है, वहीं दूसरी ओर बढ़ते हुए भूमण्डलीकरण से पुरुष यौनता सम्बंधित नयी कठिनाईयाँ सामने आयीं हैं जिनमें से सबसे प्रमुख है यौन सम्बन्धों को दिखाने वाली पोर्नोग्राफ़ी की फ़िल्में जिनसे युवाओं के मन में यौन सम्बन्ध कैसे हो इसकी गलत अपेक्षाएँ बनती हैं.

इस तरह से सेक्स दिखाने वाली फिल्में पिछले दस-बीस सालों में भारत में हर जगह डीवीडी में या इंटरनेट से आसानी से उपलब्ध हैं. लोग चाहें तो ऐसी फ़िल्मों को अपने मोबाइल टेलीफ़ोन पर भी देख सकते हैं.

पाराम्परिक सोच, यौन अंगो और सम्बन्धों के बारे में जानकारी न होना और यह सेक्स फ़िल्में, इस सब की वजह से, सेक्स कैसा होना चाहिये, यौन अंग कैसे होने चाहिये, सेक्स किस तरह करना चाहिये, सेक्स कितनी देर तक करना चाहिये, जैसी बातों पर किशोर व युवाओं के विचार बनते हैं. इसका असर यह होता है कि अगर हम उस तरह से सेक्स नहीं कर सकते या हमारे सेक्स अंग उन फ़िल्में में दिखने वाले लोगों जैसे नहीं तो हमारे मन में हीन भावना आ जाती है.

पुरुष शरीर व यौन अंग

बेमतलब की मानसिक परेशानियों से बचने के लिए आवश्यक है कि किशोरों व युवाओं को अपने शरीर तथा यौन अंगो के बारे में सही जानकारी हो.

पुरुष शरीर के यौन अंगों को नीचे की इस तस्वीर में देख सकते हैं.

Male sexuality graphic by Sunil Deepak, 2014

पुरुष में तीन प्रमुख यौन अंग होते हैं - लिंग, वीर्य बनाने वाली गोलियाँ (अण्डकोष) तथा अण्डकोष को लिंग से जोड़ने वाली नलियाँ.

इनके अतिरिक्त, लिंग की जड़ के पास प्रोस्टेट और सेमिनल वेसीकल नाम की ग्रंथियाँ होती है, जिसमें यौन क्रिया में लिंग की चिकनाई बढ़ाने के लिए तेल तथा जल जैसे पदार्थ बनते है, जिनसे वीर्यकोषों को पोषण मिलता है. वीर्य की नली, प्रोस्टेट से हो कर लिंग की जड़ में पहुँचती है.

जब वीर्य पुरुष शरीर से बाहर निकलता है तो उसका द्रव्य अधिकतर सेमिनल वेसिकल में बने पदार्थों से बनता है जिसमें सूक्षम मात्रा में अण्डकोष और प्रोस्टेट के पदार्थ जुड़ जाते हैं.

पुरुष लिंग केवल यौन अंग नहीं है, यह साथ ही पिशाब निकालने के रास्ते द्वारा गुर्दे तथा यूरेनरी ब्लेडर से भी जुड़ा होता है. जिस समय पिशाब करते हैं तो वीर्य की नली वाला रास्ता बन्द रहता है और जब वीर्य निकलने का समय आता है उस समय पिशाब का रास्ता बन्द हो जाता है.

वीर्य बनाने वाली गोलियों (अण्डकोषों) को वीर्य की फैक्टरियों जैसा समझ सकते हैं. यह गोलियाँ जब बच्चा माँ के पेट में होता है, उस समय यह पेट के अन्दर, गुर्दों के पास होती हैं और गर्भ में बच्चे के बढ़ने के साथ नीचे उतरती हैं. जब बच्चा पैदा होता है, उस समय अधिकतर बच्चों में यह गोलियाँ पेट से बाहर निकल कर, लिंग के नीचे लटक जाती हैं. अक्सर बच्चों में यह गोलियाँ, थोड़ा सा दबाओ तो वापस पेट की दीवार में या पेट के भीतर भी जा सकती हैं, लेकिन जैसे जैसे बच्चा बड़ा होता है, पेट का रास्ता बन्द हो जाना चाहिये और गोलियों को पेट में वापस नहीं जाना चाहिये.

अण्डकोषों का बाहर रहना उनके सही काम करने के लिए आवश्यक है क्योंकि वीर्य के कोषों को बाकी शरीर से ठँडा तापमान चाहिये. अगर गोलियों को ठँडा तापमान नहीं मिलता तो वीर्यकोष अच्छे नहीं बनते तथा उन लोगों को सन्तान होने में कठिनाई हो सकती है.

अगर लोग बहुत तंग जाँघिया या पैंट पहने, या फ़िर लम्बे समय तक प्रतिदिन गोलियों को गर्म जगह पर रखें (जैसे कि मोटरसाइकल पर बैठ कर) तो इससे भी वीर्य में सन्तान पैदा करने की शक्ति कम हो सकती है.

जब पुरुष नसबन्दी का ऑपरेशन कराते हैं तो अण्डकोषों के पास ही वीर्य की नली को बाँध दिया जाता है या काट दिया जाता है. इस तरह से पुरुष नसबन्दी के बाद भी वीर्यपात तो करता है और उसमें प्रोस्टेट तथा सेमिनल वेसिकल की ग्रंथियों में बना जल, तेल व अन्य पदार्थ सब कुछ पहले जैसे होते हैं, उसमें केवल वीर्यकोष नहीं होते. इस तरह से नसबन्दी के बाद भी पुरुष में सेक्स के दौरान वीर्यपात होना बन्द नहीं होता.

क्योंकि पुरुष के अण्डकोष तथा वीर्य की नलकी, शरीर के बाहर, लिंग के नीचे होती हैं, पुरुष नसबन्दी का ऑपरेशन स्त्री नसबन्दी के मुकाबले बहुत अधिक आसान है.

जब लड़का किशोरावस्था में आता है, उसका शरीर टेस्टोस्टिरोन नाम का हारमोन बनाने लगता है जिससे लिंग का आकार बढ़ता है, शरीर में बाल आ जाते हैं, आवाज़ भारी हो जाती है. उस समय उसके अण्डकोष, वीर्यकोषों को बनाना प्रारम्भ करते हैं और उसका शरीर वीर्यपात के द्वारा प्रजनन के लिए तैयार हो जाता है.

वीर्यकोष में बनने वाले कोष अगर बाहर न निकलें तो अण्डकोष के अन्दर ही मर जाते हैं, लेकिन सेमिनल वेसिकल का द्रव्य जब भर जाता है तो अक्सर रात को स्वप्नदोष के रूप में कुछ कुछ दिनों में निकलता रहता है. इस तरह वीर्य का बनना और निकलना इस फैक्टरी के सही काम करने की निशानी है और प्राकृतिक बात है.

वीर्य में क्या होता है?

वीर्य की मात्रा करीब 2 से 5 मिलीलिटर होती है. इसमें 70-75 प्रतिशत तक सेमिनल वेसीकल में बना द्रव्य होता है, 20-23 प्रतिशत प्रोस्टेट में बने पदार्थ होते हैं, 1 प्रतिशत चिकनाई के पदार्थ होते हैं और करीब 2 प्रतिशत तक वीर्यकोष होते हैं. इसमें केल्शियम, क्लोराइड, फ्रुकटोज़, मेगनीशयम, पोटिशयम जैसे तत्व सूक्षम मात्रा में होते हैं, यानि पोषित खाने में पाये जाने वाले सामान्य तत्व होते हैं.

वीर्यकोष दो तरह के होते हैं - एक्स (x) क्रमोसोम वाले तथा वाई (y) क्रोमोसोम वाले. दूसरी ओर नारी के शरीर में केवल एक तरह का अँडकोष होता है, एक्स (x) क्रोमोसोम वाला. अगर माँ के एक्स क्रोमोसोम वाले अँडकोष से पिता का एक्स (x) क्रोमोसोम वाला वीर्यकोष मिलता है तो लड़की का भ्रूण बनता है. अगर माँ के एक्स (x) क्रोमोसोम से पिता का वाई (y) क्रोमोसोम  वाला वीर्यकोष मिले तो लड़के का भ्रूण बनता है. यानि बेटा होगा या बेटी, यह पिता के वीर्य पर निर्भर करता है, माँ के अँडकोष से नहीं निर्भर करता.

अगर चाहते हैं कि यौन सम्बन्धों से लड़की गर्भवती नहीं हो तो पुरुष को अपने तने हुए लिंग पर कण्डोम चढ़ाना चढ़ा कर सम्भोग करना चाहिये. कण्डोम से गर्भ रोकने के अतिरिक्त एडस तथा सिफलिस जैसे अन्य यौन रोगों से भी बचाव होता है.

स्वप्नदोष या हस्तमैथुन

रात को सोते हुए वीर्यपात होने को स्वप्नदोष कहते हैं.

किशोरों में सेमिनल वेसिकल में द्रव्य उद्पादन बहुत बढ़ा होता है, इसलिए किशोरावस्था में सोते समय वीर्यपात होना स्वाभाविक है. जब द्रव्य शरीर में भर जाता है तो आसानी से निकल जाता है. अक्सर इसके साथ सेक्स से जुड़े सपने होते हैं.

जब लड़के हस्तमैथुन सीख जाते हैं या सेक्स सम्बन्ध बनाने लगते हैं तो वीर्य द्रव्य को बाहर निकलने के लिए स्वाभाविक रास्ता मिल जाता है और स्वप्नदोष अपने आप ही बन्द हो जाता है.

उम्र के साथ, वीर्य द्रव्य का बनना कम हो जाता है, शरीर में हारमोन कम हो जाते हैं, इस तरह से यौन इच्छा कम हो जाती है और यौन सम्बन्ध न हों तो भी स्वप्नदोष बहुत कम होता है. स्वप्नदोष तथा हस्तमैथुन दोनो को ही स्वाभाविक माना जाता है. इनसे लिंग की सम्भोग शक्ति पर कुछ असर नहीं पड़ता, यह तो शरीर में जागने वाली इच्छाओं को संतुष्ट करने के सामान्य साधान हैं.

किशोर शरीर में हारमोन बढ़े होते हैं जिनकी वजह से उनके मन में यौन इच्छा व विचारों का उठना स्वाभाविक है. इस तरह के विचार खेल, वर्जिश आदि से कम हो सकते हैं, जिससे शरीर का ध्यान दूसरी ओर हो जाता है, लेकिन बिल्कुल बन्द नहीं होते. दूसरी ओर, यौन इच्छा व विचारों को बिल्कुल बन्द करने से किशोर मन में मनोवैज्ञानिक ग्रँथियाँ बन जाती है जिससे शरीर के मानसिक विकास पर गलत प्रभाव पड़ता है.

दुर्भाग्यवश, पाराम्परिक सोच में ब्रह्मचर्य तथा वीर्य संभाल कर रखने को इतना अधिक महत्व दिया गया है कि न चाहने पर भी, किशोर व युवा, स्वप्नदोष तथा हस्तमैथुन को गलत सोचते हैं और अपनी इच्छाओं को काबू या संयम न कर पाने से खुद को अपराधी महसूस करते हैं. यौन सम्बन्धों से जुड़े बहुत सारे रोग व कठिनाईयाँ इसी अपराध भावना और मानसिक डर से उपजते हैं.

शीघ्रपतन

शीघ्रपतन का अर्थ है कि सेक्स क्रिया के शुरु होते ही जल्दी से वीर्यपतन होना. ऐसे लोग सोचते हैं कि उनमें वीर्यपतन को रोकने की शक्ति नहीं और वह लम्बे समय तक सम्भोग करने की कामना रखते हैं.

पोर्नोग्राफी की फ़िल्मों में पुरुषों को 10-30 मिनट तक या इससे भी अधिक समय तक सम्भोग करते दिखलाया जाता है. यह फ़िल्में देख कर युवा सोचने लगते हैं कि, "मुझसे तो ऐसा नहीं होता यानि मुझमें कुछ कमी है या मुझे शीघ्रपतन की तकलीफ़ है".

पुरुष यौनांग (लिंग) अँदर से स्पोँज जैसे माँस से बना होता है जिसमें रक्त के भरने से लिंग तन जाता है. सम्भोग के लिए लिंग का ठीक से तनना आवश्यक है. लेकिन लिंग के तनने में मानसिक सोच का गहरा प्रभाव है, जिसकी वजह से कहते हैं सेक्स सारा दिमाग में होता है. यानि, अगर किसी तरह की चिन्ता हो, या मन में हीन भावना हो या अपराधी भावना हो या यह सोचा जाये कि मुझमें सेक्स की क्षमता कम है तो अपने आप ही लिंग का ठीक से तनना कठिन हो जाता है.

आप के लिंग में कोई सचमुच की बीमारी है या केवल मानसिक दबाव से ऐसा हो रहा है, यह समझने के लिए दो तीन दिन तक सेक्स से परहेज करिये, फ़िर देखिये कि सोते सोते या रात में उठने पर या सुबह उठने पर पिशाब करने के समय, आप का लिंग अपने आप तनता है या नहीं - अगर तनता है तो इसका अर्थ है कि लिंग तनने में कोई बीमारी नहीं, बल्कि आप की कठिनाई मानसिक दबाव या सोच की वजह से हैं.

कभी कभी, काम से जुड़ी या जीवन की अन्य चिन्ताओं से भी शीघ्रपतन की बात जुड़ सकती है.

डायबीटिज़ या हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों से, कुछ दवाओं से, या प्रोस्टेट के ऑपरेशन के बाद भी लिंग के ठीक से तनने में कठिनाई हो सकती है. अगर सचमुच की शारीरिक कठिनाई है तो डाक्टर से सलाह लीजिये. अगर बात मानसिक दबाव की है तो सोचिये की क्या आप को सचमुच शीघ्रपतन की तकलीफ़ है या आप पोर्नोग्राफ़ी फ़िल्मों से या अन्य लोगों से सुनी बातों से अपने आप से गलत अपेक्षाएँ बना रहे हैं?

अगर वीर्यपात लिंग तनने के एक मिनट के अंदर हो जाये तो उसे शीघ्रपतन माना जाता है. अगर वीर्यपात एक मिनट से अधिक अविधि के बाद हो तो उसे शीघ्रपात नहीं कहते. औसत पुरुष में वीर्यपात, सम्भोग के शुरु होने से 5 से 8 मिनट के समय में होता है.

पोर्नोग्राफ़ी की फ़िल्मों में जब पुरुषों को आधे घँटे या अधिक समय तक सम्भोग करते हुए दिखाया जाता है तो अक्सर वह एक वीर्यपात के बाद वियागरा जैसी दवाओं से लिंग को तना कर किया जाता है, या फ़िर सम्भोग के दृश्य को विभिन्न एक्टरों के साथ करके जोड़ दिया जाता है. अपने लिंग की लम्बाई को या सम्भोग करने के समय को पोर्नोग्राफ़ी फ़िल्मों के मापदँड पर तौलना बेवकूफ़ी है.

शीघ्रपात का इलाज

सेक्स का उद्देश्य आप को तथा आप के सम्भोग साथी को सुख व आनन्द देना है. सम्भोग कितना लम्बा हुआ या लिंग कितना बड़ा या मोटा है, सेक्स का आनन्द उस पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि आप में अपने साथी की ज़रुरतों को पहचानने की और उन्हे पूरा करने की क्षमता है या नहीं.

एक बार मन से यौन सम्भोग की लम्बाई की चिन्ता को छोड़ कर, कैसे साथी को यौन आनन्द के चर्म पर पहुँचायें की चिन्ता करेंगे तो शीघ्रपात की बात भूल जायेंगे. नारी सम्भोग में यौन आनन्द देने के बारे में मैंने पहले एक बार लिखा था, आप उस आलेख को फ़िर से पढ़ सकते हैं.

सम्भोग की अविधि बढ़ाने के लिए कई तरह के उपाय बताये जाते हैं, जैसे कि कण्डोम पहनना या ज़ाइलोकेन (Xylocaine jelly) जैसी एनिस्थेटिक क्रीम लगाना जिससे लिंग को स्पर्श की अनुभूति कम हो. एक अन्य उपाय है सम्भोग के पहले हस्तमैथुन करना और आवश्यकता पड़ने पर वियाग्रा जैसे दवाई की सहायता से सम्भोग करना.

मेरे विचार में यह उपाय उतना काम नहीं करते क्योंकि सेक्स लिंग की अनुभूति से अधिक हमारे दिमाग में क्या है, उस पर अधिक निर्भर करता है. जब तक मन में चिन्ता रहेगी, कुछ अन्य उपाय काम नहीं करेंगे. मेरी सलाह है कि सेक्स सम्बन्धी चिन्ता घटाने के लिए मानसिक डीकन्डीशनिंग करिये जिसका एक तरीका नीचे बता रहा हूँ.

यौन सम्बन्ध बेहतर करने के लिए मानसिक सोच को सुधारना

मानसिक डीकन्डीशनिंग का एक तरीका है जिसका उद्देश्य है अपने साथी के साथ मिल कर, एक दूसरे के शरीर को जानना तथा भीतरी अनुभूतियों को समझना. इससे आत्मविश्वास बढ़ता है, यौन साथियों में आत्मीयता बढ़ती है तथा यौन सम्बन्धों में सुधार होता है.

इसके लिए पहले तीन दिनों तक सोते समय अपने साथी से सट कर लेटिये, बस एक ही शर्त है कि कुछ भी हो जाये, आप हाथों से एक दूसरे के यौन अंगों को नहीं छूएगें और सम्भोग करने की कोशिश नहीं करेंगे. न पुरुष को वीर्यपात हो, न नारी को यौनान्द का चर्म मिले. हो सके तो इसे निर्वस्त्र हो कर या कम वस्त्र पहन कर कीजिये. इन तीन दिनों में आप को एक दूसरे के यौन अंगो को छोड़ कर शरीर के विभिन्न हिस्सों में क्या अनुभूतियाँ होती हैं, उन्हें समझना व जानना है. मन में चाहे जितनी भी यौन आनन्द या सम्भोग की इच्छा उठे, उस पर ध्यान नहीं दीजिये. बल्कि यह समझने की कोशिश कीजिये कि यौन इच्छा के साथ शरीर के विभिन्न भागों में किस तरह की अनुभूतियाँ उठती हैं. उस समय अपने मन में क्या विचार आते हैं, उन्हें अपने साथी से बाँटिये.

तीन दिनों के बाद, अगले तीन दिनों तक, बिना सम्भोग के, आप को एक दूसरे को यौन आनन्द के चर्म तक ले जाना है. चाहे वह हाथों के सहारे करिये, चाहे मुँह के, चाहे शरीर के किसी अन्य अंग की सहायता से, बस अपने यौन अंगों को आपस में नहीं छूने दीजिये. इन तीन दिनों में आप का ध्येय है बिना सम्भोग के यौन आनन्द कैसे होता है, इसे समझना, एक दूसरे के शरीर को जानना कि शरीर के कौन से हिस्से में यौन अनुभूतियाँ होती हैं, किस अनुभूति से आप को तथा आप के साथी को अधिक आनन्द मिलता है. सेक्स में कोई जबरदस्ती नहीं होनी चाहिये, हर बात दोनो की मर्ज़ी से होनी चाहिये,

सातवें दिन के बाद आप पूर्ण सम्भोग कर सकते हैं. अगर आप को लगे कि शीघ्रपतन की बात में पूरा सुधार नहीं हुआ तो छहः दिन की डीकन्डीशनिंग को दोबारा से करिये.

निष्कर्श

पुरुष यौनता के साथ बहुत सी चिन्ताएँ जुड़ी हैं. इन चिन्ताओं की वजह से पुरुष के मन में अक्सर डर आ जाता है जो शीघ्रपत्न या स्वप्नदोष जैसी समस्याओं को बना देता है.

इन समस्याओं के एक बड़ा कारण है यौन अंगो तथा क्रिया के बारे में सही जानकारी का न होना. पराम्परिक सोच का भी, जैसे कि वीर्य को अमूल्य मानना या हस्तमैथुन को गलत सोचना, मानसिक चिन्ता बना सकते हैं जिनसे शरीर की यौन शक्ति पर गलत प्रभाव पड़ता है.

मन से चिन्ता को हटाना और अपने सेक्स साथी के साथ अपने शरीर को जानना और अपनी इच्छाओं को समझना, इससे सेक्स सम्बन्धी समस्याओं का निदान हो सकता है. इसमें डीकन्डीनिंग जैसे तरीकों से मदद मिल सकती है.

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नारी और यौन सुख

पहले भी कई बार सेक्स सम्बँधी विषयों पर लिख चुका हूँ, लेकिन इस विषय पर कुछ भी लिखने की सोचूँ तो हर बार मेरे बचपन में सीखे भद्रता-अभद्रता या शालीनता-अश्लीलता के पाठ हर बार मन में कुछ दुविधा सी कर देते हैं कि क्या इन बातों पर चिट्ठे जैसे माध्यम पर लिखना ठीक होगा? फ़िर सोचता हूँ कि इस विषय पर स्पष्ट सरल भाषा में जानकारी मिलना इतना कठिन है कि भद्रता-अभद्रता की बात सोच कर रुकना गलत होगा.

यौन विषयों पर लिखे मेरे आलेख मेरे चिट्ठे के सबसे अधिक पढ़े जाने वाले आलेखों में से हैं, हालाँकि मेरे विचार में इन पन्नों पर कुछ विषेश शब्दों को खोजते हुए जो लोग गलती से आ जाते हैं शायद उन्हें वह नहीं मिलता जिसकी वे आशा कर रहे होते हैं! दूसरी ओर, मुझे इन विषयों पर नियमित रूप से ईमेल के संदेश भी मिलते रहते हैं. यह संदेश अधिकतर पुरुषों के होते हैं या अंतरलैंगिकता के विषय पर होते हैं, जो मुझसे अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के बारे में सलाह माँगते हैं. तब कुछ हैरानी सी होती है जब नवयुवक यौन सम्बंधों के बारे में पूछते हैं, सोचता हूँ कि इस सदी में जब ईंटरनेट पर इस विषय पर इतनी जानकारी भरी पड़ी है, तो भी यह लोग किस तरह की बातों के बारे में चिन्तित होते रहते हैं!

मेरी समझ में भारतीय नवयुवकों की इस चिन्ता में उस भारतीय पाराम्परिक सोच का बड़ा हाथ है जिसके अनुसार पुरुष का वीर्य सम्भाल कर रखना चाहिये, उसको खोने से उनका पौरुष खो जाता है या कम हो जाता है. पढ़े लिखे, पोस्टग्रेजूएट लोग जब लड़कपन के हस्तमैथुन करने और उसके परिणाम स्वरूप शरीर में आयी कमज़ोरी और होने वाले विवाह के बारे में चिन्ता व्यक्त करते हैं कि अगर वे अपनी पत्नी के साथ यौन सम्बँध बना पाने में असमर्थ हुए तो क्या होगा, तो आश्चर्य होता है. सोचता हूँ कि यह लोग किस दुनिया में रहते हैं, क्या इन्होंने वियाग्रा जैसी गोलियों के बारे में भी नहीं सुना?

वैसे तो मेरे विचार में वियाग्रा का इस तरह का प्रयोग केवल मानसिक ग्रँथियों को छुपाता है. इस सोच की असली वजह इन नवयुवकों की मानसिक चिन्ता और घुट्टी में मिली सोच है कि ब्रह्मचर्य से शरीर तँदरुस्त होता है और हस्तमैथुन उसे कमज़ोर करता है. नवयुवकों में यौन सम्बंधों से जुड़ी बीमारियों के बारे में और कैसे कण्डोम के प्रयोग से कई यौन रोगों से बचा जा सकता है, की जानकारी की भी बहुत कमी है. इंटरनेट पर पोर्नोग्राफ़ी से व ब्लू फ़िल्मों से नर-नारी के बीच के सहज यौन सम्बँधों की समझ के बदले, सेक्स के बारे में एकतरफ़ा बिगड़ी समझ मिलती है जिससे नवयुवक सोचते हैं कि पुरुष के लिँग के आकार से या नारी को पीड़ा देने से या हिँसक यौन सम्बँध बनाने से अच्छा सेक्स होता है.

नारी का शरीर और यौन अंग क्या होते हैं, नारी को यौन सुख किस तरह से मिलता है, या पुरुष और नारी के बीच कैसे एक दूसरे को यौन संतुष्टी दे सकते हैं इसकी समझ अक्सर लोगों को नहीं होती. मेरे विचार में यह बात केवल नौसिखिया नवयुकों की नहीं है, बल्कि अक्सर विवाहित या अनुभवी पुरुषों में भी यह समझ पूरी नहीं होती. दूसरी ओर, स्त्रियों में भी अपने शरीर के बारे में पूरी समझ नहीं होती.

कुछ मास पहले नारी यौन सुख के विषय पर अमरीका के सियेटल के एक अखबार में स्तंभ लिखने वाले डेन सेवेज (Dan Savage) का एक आलेख पढ़ा था जिसमें उन्होंने नारी यौन सुख क्या होता है उसके बारे में बहुत स्पष्ट और दो टूक शब्दों में लिखा था. डेन स्वयं समलैंगिक हैं पर उनके आलेख समलैंगिकता या विषमलैंगिकता के दायरों से बाहर निकल कर, शरीर, यौनता और सेक्स विषयों को बहुत स्पष्ट तरीके से छूते हैं.

नारी यौन सुख के बारे में उन्हें एक पुरुष का पत्र मिला था जिसमें पूछा गया था कि वह सम्भोग द्वारा अपनी प्रेमिका को यौन सुख का चर्म नहीं दे पाता था और उसने डेन से सलाह माँगी थी. अपने आलेख में डेन ने इस प्रश्न का उत्तर दिया था (अंग्रेज़ी के आलेख के कुछ हिस्सों का हिन्दी में मेरा अनुवाद है):

"सम्भोग से पहले तुम्हें नारी शरीर के बारे में जानना चाहिये. अधिकतर औरतों को केवल सम्भोग से यौन सुख का चर्म (ऑरगेज़्म) नहीं मिलता. क्योंकि नारी शरीर में यौन अनुभूति में क्लाइटोरिस (यानि यौनिद्वार के पास का उठा हुआ हिस्सा जो पुरुष लिंग जैसे माँस से बना होता है) का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है जैसे कि पुरुष के यौन सुख में उसके लिंग का सबसे महत्वपूर्ण स्थान होता है. अगर सम्भोग में क्लाटोरिस को सही तरह से अनुभूति नहीं मिलेगी तो नारी को यौन सुख कैसे मिलेगा? क्लाइटोरस यौनी के बाहर होती है, यौनी के अन्दर नहीं. तुम्हारा लिंग कितना भी बड़ा या तना हुआ क्यों न हो, अगर तुमने क्लाइटोरिस को नहीं छुआ तो बात नहीं बनेगी.
कुछ औरतों में क्लाइटोरिस इस कोण पर बना होता है कि सम्भोग के दौरान, उसे अपने आप रगड़न मिलती है, इस तरह से उन्हें केवल सम्भोग से पूरा यौन सुख मिल जाता है. पर अगर उनका क्लाइटोरिस ऐसे कोण वाला नहीं है तो कितनी देर भी सम्भोग करोगे, उन्हें यौन सुख नहीं मिलेगा.
70 प्रतिशत औरतों को सम्भोग के साथ साथ क्लाइटोरिस की अतिरिक्त अनूभूति चाहिये तभी वह यौन सुख के चर्म को अनुभव कर सकती हैं. तुम सोचो कि अगर तुम्हारी प्रेमिका तुम्हारे लिंग को केवल पैर से कभी कभी छू ले, और तुम्हें अन्य कुछ न करने दे तो क्या तुम्हें यौन सुख मिलेगा और क्या तुम इसे स्वीकार करोगे? तो तुम्हारी प्रेमिका इसे क्यों स्वीकारे कि तुम उसको यौन की सबसे अच्छी अनुभूति देने वाले उसके अंग को भूल जाओ?"
क्लाइटोरिस शरीर कें कहाँ पर होती है यह आप विकीपीडिया के पृष्ठ पर चौथे नम्बर की तस्वीर में देख सकते हैं जिसमें 1 नम्बर पर क्लाटोरिस के ऊपर की चमड़ी और 2 नम्बर पर क्लाइटोरिस को दिखाया गया है. 3 नम्बर पर यूरिथ्रा यानि मूत्र द्वार है और 4 नम्बर पर यौनी का द्वार.

हिन्दी के विकीपीडिया पर क्लाइटोरिस के बारे में जानकारी तो है लेकिन उस पृष्ठ पर तस्वीरें नहीं हैं. हिन्दी में क्लाइटोरस को भगशिश्न, भंगाकुर, भगनासा आदि कहते हैं लेकिन शायद इन शब्दों को समझने वाले लोग कम ही होंगे.

इस विषय पर हिन्दी में खोजा तो एक वेबपृष्ठ मिला जिसके अनुसार क्लाइटोरिस की अनुभूति की इच्छा केवल लेस्बियन युवतियों को होती है, इस तरह से इंटरनेट पर कुछ गलत जानकारी भी मिलती है.

अगर आपने यौन विषय पर खुल कर कभी बात नहीं की तो झिकझिकाहट हो सकती है लेकिन मैं मानता हूँ कि यौनसुख मानव जीवन के सबसे अमूल्य अनुभवों में से है, इसलिए अपने शरीर को समझना, अपनी इच्छाओं व आकांक्षाओं को पूरा करना बहुत आवश्यक है!

मेरा व्यक्तिगत विचार है कि पति-पत्नि या प्रेमी-प्रेमिका के बीच में वह सब कुछ जायज़ है जिसे वह दोनो स्वतंत्रता से स्वीकार करते हैं और जिससे उन्हें आनन्द मिलता है. प्रेम और सेक्स में जबरदस्ती की कोई जगह नहीं, अगर कोई बात एक साथी को मान्य नहीं तो उसकी सेक्स में कोई जगह नहीं होनी चाहिये! पर साथ ही मेरा मानना है कि बिना आपसी प्रेम और स्नेह के सेक्स में सुख नहीं केवल खालीपन है, लेकिन शायद इस बारे में मेरे विचार कुछ पुराने तरीके हैं!

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हिन्दी में समलैंगिकता विषय पर लेखन


प्रोफेसर अलेसाँद्रा कोनसोलारो उत्तरी इटली में तोरीनो (Turin) शहर में विश्वविद्यालय स्तर पर हिन्दी की प्रोफेसर हैं. उन्होंने बात उठायी मेरे एक 2007 में लिखे आलेख की जिसमें मैंने हिन्दी पत्रिका हँस में तीन हिस्सों में छपी हिन्दी के जाने माने लेखक पँकज बिष्ट की कहानी "पँखोंवाली नाव" की बात की थी. अलेसाँद्रा ने मुझसे पूछा कि क्या यह कहानी कहीं से मिल सकती है? इस कहानी में दो मित्र थे, जिनमें से एक समलैंगिक था. मैंने अपने आलेख में एक ओर तो बिष्ट जी द्वारा समलैंगिकता के विषय को छूने का साहस करने की सराहना की थी, वहीं मुझे यह भी लगा था कि इस कहानी में समलैंगिकता को "बाहर" या "विषमलैंगिक" दृष्टि से देखा सुनाया गया है, उसमें कथा के समलैंगिक पात्र के प्रति आत्मीयता कम है.

जहाँ तक मुझे मालूम है, बीच में कुछ समय तक हँस में छपी सामग्री इंटरनेट पर भी मिल जाती थी, लेकिन बहुत समय यह बन्द है. मेरे पास 2007 के हँस के कुछ अंक हैं लेकिन यह कहानी पूरी नहीं है, उसका बीच का भाग जो सितम्बर 2007 के हँस में छपा था, वह नहीं है. क्या आप में कोई सहायता कर सकता है या कोई तरीका है सितम्बर 2007 अंक से इस कहानी को पाने का? अगर किसी के पास हँस का वह अंक हो तो उसे स्कैन करके मुझे भेज सकता है.

अलेसाँद्रा के कुछ अन्य प्रश्न भी थे - हिन्दी में समलैंगिकता-अंतरलैंगिकता के विषय पर कौन सी महत्वपूर्ण कहानियाँ और उपन्यास हैं? हिन्दी में समलैंगिक या अंतरलैंगिक लेखक या लेखिकाएँ हैं? अगर हाँ तो वह इस विषय पर क्या लिख रहे हैं?

अलेसाँद्रा के इन प्रश्नों का मेरे पास कोई उत्तर नहीं. इंटरनेट पर खोजने से कुछ नहीं मिला. क्या आप में कोई इस विषय में हमारी सहायता कर सकता है यह जानकारी एकत्रित करने के लिए कि इस विषय पर किस तरह का लेखन हिन्दी में है और हो सके तो उनके लेखकों से सम्पर्क कराने के लिए?

Queer writing - graphic by S. Deepak, 2013

पिछले दशकों में लेखन और साहित्य विधाओं में सच्चेपन (authenticity) और "जिसकी आपबीती हो वही अपने बारे में लिखे" की बातें उठी हैं. इस तरह से साहित्य में नारी लेखन, शोषित जनजातियों के लोगों के लेखन, दलित समाज के लोगों के लेखन, जैसी विधाएँ बन कर मज़बूत हुई हैं. इन्हीं दबे और हाशिये से बाहर किये गये जन समूहों में समलैंगिक तथा अंतरलैंगिक व्यक्ति समूह भी हैं, जिनके लेखन की अलग साहित्यिक विधा बनी गयी है जिसे अंग्रेज़ी में क्वीयर लेखन (Queer writings) कहते हैं. शब्दकोश के अनुसार "क्वीयर" का अर्थ है विचित्र, अनोखा, सनकी या भिन्न. यानि अगर बात लोगों के बारे में हो रहे हो तो इसका अर्थ हुआ आम लोगों से भिन्न. लेकिन अँग्रेज़ी में "क्वीयर" का आधुनिक उपयोग "यौनिक भिन्नता" की दृष्टि से किया जाता है. तो इस तरह के लेखन को बजाय "समलैंगिक-अंतरलैंगिक लेखन" कहने के बजाय हम "यौनिक भिन्न लेखन" भी कह सकते हैं. पश्चिमी देशों में विश्वविद्यालय स्तर पर जहाँ साहित्य की पढ़ायी होती है, तो उसमें साहित्य के साथ साथ, नारी लेखन, जनजाति लेखन, यौनिक भिन्न लेखन, विकलाँग लेखन, जैसे विषयों की पढ़ायी भी होती है.

नारी लेखन, दलित या जन जाति लेखन जैसे विषयों पर मैंने हँस जैसी पत्रिकाओं में या कुछ गिने चुने ब्लाग में पढ़ा है. लेकिन हिन्दी में विकलाँगता लेखन या समलैंगिक लेखन, इसके बारे में नहीं पढ़ा.

बहुत से लोग, लेखकों और लेखन को इस तरह हिस्सों में बाँटने से सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि लेखन केवल आपबीती नहीं होता, कल्पना भी होती है. अगर हम यह कहने लगें कि लेखक केवल अपनी आपबीती पर ही लिखे तो दुनिया के सभी प्रसिद्ध लेखकों का लिखना बन्द जाये. खुले समाज में जहाँ जन समान्य निर्धारित करे कि जो आप ने लिखा है वह पढ़ने लायक है या नहीं, उसे लोग खरीद कर पढ़ना चाहते हें या नहीं, यही लेखन की सार्थकता की सच्ची कसौटी है.

दूसरी ओर यह भी सच है कि समाज के हाशिये से बाहर किये और शोषित लोगों की आवाज़ों को शुरु से ही इतना दबाया जाता है कि वह आवाज़ें मन में ही घुट कर रह जाती हैं, कभी निकलती भी हैं तो इतनी हल्की कि कोई नहीं सुनता. आधा सच जैसे प्रयास भी अक्सर हर ओर से चारदीवारियों में घेर कर बाँध दिये जाते हैं जिन पर उन चारदीवारों से बाहर चर्चा न के बराबर होती है. इस स्थिति में यौनिक भिन्न लेखन की बात करके उन आवाज़ों को पनपने और बढ़ने का मौका देना आवश्यक है. जब उन आवाज़ों में आत्मविश्वास आ जाता है तो वह खुले समाज में अन्य लेखकों की तरह सबसे खुला मुकाबला कर सकती हैं.

रुथ वनिता तथा सलीम किदवाई द्वारा सम्पादित अँग्रेज़ी पुस्तक "भारत में समलैंगिक प्रेम - एक साहित्यिक इतिहास" ("Same sex love in India - a literary history" edited by Ruth Vanita and Saleem Kidwai, Penguin India, 2008) कुछ आधुनिक लेखकों की रचनाओं की बात करती है.

रुथ से मैंने पूछा कि अगर कोई लेखक जो स्वयं को समलैंगिक/द्विलैंगिक/अंतरलैंगिक न घोषित करते हुए भी यौनिक भिन्नता के बारे में लिखें तो क्या उसे "यौनिक भिन्न साहित्य" माना जायेगा?

तो रुथ ने कहा कि "यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि आप "क्वीयर" को किस तरह परिभाषित करते हैं? मेरे विचार में इस विषय पर कोई भी लिखे, चाहे वह स्वयं को यौनिक रूप से भिन्न परिभाषित करे या न करे, वह स्वीकृत होगा. किसकी यौनता क्या है, यह हम कैसे जान सकते हैं? इस विषय पर बहुत से हिन्दी लेखकों ने लिखा है जैसे कि राजेन्द्र यादव,निराला, उग्र तथा विषेशकर, विजयदान देथा जिन्होंने राजस्थानी में लिखा, उस सब को "समलैंगिक साहित्य" कह सकते हैं. चुगताई का लिखा जैसे कि "तेरही लकीर" के हिस्से और "लिहाफ़" भी इसी श्रेणी में आता है, हालाँकि यह उर्दू में लिखे गये. हरिवँश राय बच्चन की आत्मकथा, "क्या भूलूँ क्या याद करूँ" में वह भाग है जिसके बारे में नामवर सिंह ने कहा था कि वह एक पुरुष का दूसरे पुरुष के लिए प्रेम की स्पष्ट घोषणा थी."

यह जान कर अच्छा लगा कि हिन्दी-उर्दू जगत में जाने माने लेखकों ने इस विषय को छूने का साहस किया है, आज से नहीं, बल्कि कई दशकों से यह हो रहा है. लेकिन मैंने सोचा कि रूथ के दिये सभी उदाहरण कम से कम 1960-70 के दशक से पहले के हैं. जबकि मुझे अपने प्रश्न का उत्तर नहीं मिला कि, पिछले तीस चालिस सालों में यौनिक भिन्नता की दृष्टि से, पँकज बिष्ट की हँस में छपी कहानी "पँखवाली नाव" के अतिरिक्त क्या कुछ अन्य लिखा गया?

इस बहस में एक अन्य दिक्कत है जो कि साँस्कृतिक है और मूल सोच के अन्तरों से जुड़ी हुई है. पश्चिमी विचारक, कोई भी विषय हो, चाहे विज्ञान या दर्शन, वनस्पति या मानव यौन पहचान, वे हमेशा हर वस्तु, हर सोच को श्रेणियों में बाँटते हैं. जबकि भारतीय परम्परा के विचारक में हर वस्तु, हर सोच में समन्वय की दृष्टि देखते हैं. इस तरह से बहुत से यौनिक मानव व्यवहार हैं जिन्हें भारतीय समाज ने समलैंगिक-अंतरलैंगिक-द्वीलैंगिक श्रेणियों में नहीं बाँटा. जैसे कि महाभारत में चाहे वह शिखण्डी के लिँग बदलाव की कथा हो या अर्जुन का वर्ष भर नारी बन के जँगल घूमना हो, इन कथाओं में परम्परागत भारतीय विचारकों ने यौनिक भिन्नता की परिभाषाएँ नहीं खोजीं. तो सँशय उठता है कि हिन्दी में "क्वीयर साहित्य" की पहचान करना, भारतीय सोच और दर्शन को पश्चिमी सोच के आईने में टेढ़ा मेढ़ा करके बिगाड़ तो नहीं देगा?

इसी भारतीय तथा पश्चिमी सोच के अन्तर के विषय पर एक अन्य उदाहरण श्री अमिताव घोष की अंगरेज़ी में लिखी पुस्तक "सी आफ पोप्पीज़" (Sea of poppies) है जिसमें एक पात्र हैं बाबू नबोकृष्णो घोष जो तारोमयी माँ के भक्त हैं और इसी भक्ति में लीन हो कर स्वयं को माँ तारोमयी का रूप समझते हैं. इस पात्र की कहानी को केवल अंतरलैंगिकता या समलैंगिकता के रूप में देखना, उसकी साँस्कृतिक तथा आध्यात्मिक जटिलता का एकतरफ़ा सरलीकरण होगा जिससे पात्र को केरिकेचर सा बना दिया जायेगा. इसलिए भारतीय भाषाओं में "क्वीयर लेखन" की बहस में इस बात पर ध्यान रखना भी आवश्यक है.

जैसे रुथ ने कहा कि कोई भी इस विषय पर अच्छा लिखे, तो अच्छी बात है और उसे सराहना चाहिये. लेकिन मेरी नज़र में यह उतना ही महत्वपूर्ण कि स्वयं को "यौनिक भिन्न" स्वीकारने वाले लोग भी लिखें. भारतीय समाज ने अक्सर इस दिशा में बहुत संकीर्ण दृष्टिकोण लिया है. इस सारी बहस को अनैतिक, गैरकानूनी व अप्राकृतिक कह कर समाज ने लाखों व्यक्तियों को शर्म और छुप छुप कर जीने, अन्याय सहने, घुट घुट कर मरने के लिए विवश किया है. पिछले दशक में इस बारे में कुछ बात खुल कर होने लगी है. ओनीर की "माई ब्रदर निखिल" और "आई एम" जैसी फ़िल्मों ने इस बहस को अँधेरे से रोशनी में लाने की कोशिश की है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध लेखक विक्रम सेठ ने अपने द्विलैंगिक होने के बारे में लिखा है. इस तरह से अगर यौनिक भिन्न लोग अपनी भिन्नता को स्वीकारते हुए लिखेंगे तो इस विषय को शर्म और अँधेरे में छुपे रहने से बाहर निकलने का रास्ता मिलेगा.

आज की दुनिया में अपने विचार अभिव्यक्त करने के लिए ब्लाग सबसे आसान माध्यम है. बड़े शहरों में और अंग्रेज़ी बोलने वाले युवक युवतियों ने ब्लाग की तकनीक का लाभ उठा कर "भिन्न यौनिक" ब्लाग बनाये हैं, जैसे कि आप इन तीन उदाहरणों में देख सकते हैं -  एक, दो, तीन.

जहाँ तक मुझे मालूम है, हिन्दी का केवल एक चिट्ठा है "आधा सच" जिसपर कुछ किन्नर या अंतरलैंगिक व्यक्ति अपनी बात कहते हैं. क्या इसके अतिरिक्त क्या कोई अन्य हिन्दी, मैथिली, भोजपुरी, अवधी, राजस्थानी आदि में इस तरह के अन्य चिट्ठे हैं? क्या स्थानीय स्तरों पर भारत के छोटे शहरों में, कस्बों में भी इस विषय पर लोगों ने कुछ लिखने की हिम्मत की है? क्या कुछ अंडरग्राइड पत्रिकाएँ या किताबें छपी हैं इस विषय पर?

यह नहीं कि चिट्ठों पर इस विषय पर लिखने मात्र से वह "यौनिक भिन्न" साहित्य हो जायेगा. साहित्य होने के लिए उसे साहित्य के मापदँडों पर भी खरा उतरना होगा, लेकिन शायद उन्हें शुरुआत की तरह से तरह से देखा जा सकता है जहाँ कल के "यौनिक भिन्न" साहित्य जन्म ले सकते हैं.

अगर आप के पास इस बारे में कोई जानकारी है तो कृपया मुझसे ईमेल से सम्पर्क कीजिये या नीचे टिप्पणीं छोड़िये. इस सहायता के लिए आप को पहले से ही मेरा धन्यवाद.

आप मुझसे ईमेल के माध्यम से सम्पर्क कर सकते हैं. मेरा ईमेल पता है sunil.deepak(at)gmail.com (ईमेल भेजते समय "(at)" को हटा कर उसकी जगह "@" को लगा दीजिये)

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