7 जन॰ 2015

पुरुष यौनता की कठिनाईयाँ

अक्सर लोग, विषेशकर युवा, मुझसे ईमेल के माध्यम से स्वप्नदोष या शीघ्रपतन के बारे में सलाह माँगते हैं, कि क्या करना चाहिये. किशोरों तथा युवाओं के मन में इस तरह की चिन्ताएँ उठना कुछ हद तक स्वाभाविक है, क्योंकि इस विषय पर अन्य लोगों से बात करना या सलाह माँगना आसान नहीं है.

आज की पोस्ट में इसी विषय में बात करना चाहता हूँ - यानि, पुरुष यौन अंग कौन से होते हैं, किस तरह काम करते हैं और शीघ्रपतन तथा स्वप्नदोष क्या होते हैं.

Male sexuality graphic by Sunil Deepak, 2014

भारत में पुरुष यौनता से जुड़े पाराम्परिक विश्वास

भारत के पाराम्परिक विश्वास में पुरुष वीर्य को बहुत महत्व दिया गया है. कहते हैं कि वीर्य की एक बूँद कई लाख खून के कणों से बनती है. इसलिए वीर्य पतन के साथ शारारिक कमज़ोरी को जोड़ा गया है और नवयुवाओं को ब्रह्मचर्य पालन यानि वीर्य को सम्भाल कर रखने की सलाह दी जाती है.

इस वजह से हस्तमैथुन को गलत माना जाता है और यह सोच बनती है कि हस्तमैथुन करने वाले नवयुवक धीरे धीरे सामान्य सम्भोग की शक्ति खो बैठते हैं जिसकी वजह से वह यौनक्रिया के काबिल नहीं रहते और उनमें शीघ्रपतन या स्वप्नदोष जैसी "बीमारियाँ" उभर आती हैं. इस मानसिक सोच से जुड़े डरों के के आसपास बहुत से हकीम-वैद्य-डाक्टरों के कारोबार टिके हैं जो इस डर का फायदा उठाते हैं.

पुरुष यौनता और भूमण्डलीकरण

जहाँ एक ओर पाराम्परिक सोच वीर्य को सम्भालने की बात करती है तथा हस्तमैथुन, स्वप्नदोष आदि को बीमारियाँ मानती है, वहीं दूसरी ओर बढ़ते हुए भूमण्डलीकरण से पुरुष यौनता सम्बंधित नयी कठिनाईयाँ सामने आयीं हैं जिनमें से सबसे प्रमुख है यौन सम्बन्धों को दिखाने वाली पोर्नोग्राफ़ी की फ़िल्में जिनसे युवाओं के मन में यौन सम्बन्ध कैसे हो इसकी गलत अपेक्षाएँ बनती हैं.

इस तरह से सेक्स दिखाने वाली फिल्में पिछले दस-बीस सालों में भारत में हर जगह डीवीडी में या इंटरनेट से आसानी से उपलब्ध हैं. लोग चाहें तो ऐसी फ़िल्मों को अपने मोबाइल टेलीफ़ोन पर भी देख सकते हैं.

पाराम्परिक सोच, यौन अंगो और सम्बन्धों के बारे में जानकारी न होना और यह सेक्स फ़िल्में, इस सब की वजह से, सेक्स कैसा होना चाहिये, यौन अंग कैसे होने चाहिये, सेक्स किस तरह करना चाहिये, सेक्स कितनी देर तक करना चाहिये, जैसी बातों पर किशोर व युवाओं के विचार बनते हैं. इसका असर यह होता है कि अगर हम उस तरह से सेक्स नहीं कर सकते या हमारे सेक्स अंग उन फ़िल्में में दिखने वाले लोगों जैसे नहीं तो हमारे मन में हीन भावना आ जाती है.

पुरुष शरीर व यौन अंग

बेमतलब की मानसिक परेशानियों से बचने के लिए आवश्यक है कि किशोरों व युवाओं को अपने शरीर तथा यौन अंगो के बारे में सही जानकारी हो.

पुरुष शरीर के यौन अंगों को नीचे की इस तस्वीर में देख सकते हैं.

Male sexuality graphic by Sunil Deepak, 2014

पुरुष में तीन प्रमुख यौन अंग होते हैं - लिंग, वीर्य बनाने वाली गोलियाँ (अण्डकोष) तथा अण्डकोष को लिंग से जोड़ने वाली नलियाँ.

इनके अतिरिक्त, लिंग की जड़ के पास प्रोस्टेट और सेमिनल वेसीकल नाम की ग्रंथियाँ होती है, जिसमें यौन क्रिया में लिंग की चिकनाई बढ़ाने के लिए तेल तथा जल जैसे पदार्थ बनते है, जिनसे वीर्यकोषों को पोषण मिलता है. वीर्य की नली, प्रोस्टेट से हो कर लिंग की जड़ में पहुँचती है.

जब वीर्य पुरुष शरीर से बाहर निकलता है तो उसका द्रव्य अधिकतर सेमिनल वेसिकल में बने पदार्थों से बनता है जिसमें सूक्षम मात्रा में अण्डकोष और प्रोस्टेट के पदार्थ जुड़ जाते हैं.

पुरुष लिंग केवल यौन अंग नहीं है, यह साथ ही पिशाब निकालने के रास्ते द्वारा गुर्दे तथा यूरेनरी ब्लेडर से भी जुड़ा होता है. जिस समय पिशाब करते हैं तो वीर्य की नली वाला रास्ता बन्द रहता है और जब वीर्य निकलने का समय आता है उस समय पिशाब का रास्ता बन्द हो जाता है.

वीर्य बनाने वाली गोलियों (अण्डकोषों) को वीर्य की फैक्टरियों जैसा समझ सकते हैं. यह गोलियाँ जब बच्चा माँ के पेट में होता है, उस समय यह पेट के अन्दर, गुर्दों के पास होती हैं और गर्भ में बच्चे के बढ़ने के साथ नीचे उतरती हैं. जब बच्चा पैदा होता है, उस समय अधिकतर बच्चों में यह गोलियाँ पेट से बाहर निकल कर, लिंग के नीचे लटक जाती हैं. अक्सर बच्चों में यह गोलियाँ, थोड़ा सा दबाओ तो वापस पेट की दीवार में या पेट के भीतर भी जा सकती हैं, लेकिन जैसे जैसे बच्चा बड़ा होता है, पेट का रास्ता बन्द हो जाना चाहिये और गोलियों को पेट में वापस नहीं जाना चाहिये.

अण्डकोषों का बाहर रहना उनके सही काम करने के लिए आवश्यक है क्योंकि वीर्य के कोषों को बाकी शरीर से ठँडा तापमान चाहिये. अगर गोलियों को ठँडा तापमान नहीं मिलता तो वीर्यकोष अच्छे नहीं बनते तथा उन लोगों को सन्तान होने में कठिनाई हो सकती है.

अगर लोग बहुत तंग जाँघिया या पैंट पहने, या फ़िर लम्बे समय तक प्रतिदिन गोलियों को गर्म जगह पर रखें (जैसे कि मोटरसाइकल पर बैठ कर) तो इससे भी वीर्य में सन्तान पैदा करने की शक्ति कम हो सकती है.

जब पुरुष नसबन्दी का ऑपरेशन कराते हैं तो अण्डकोषों के पास ही वीर्य की नली को बाँध दिया जाता है या काट दिया जाता है. इस तरह से पुरुष नसबन्दी के बाद भी वीर्यपात तो करता है और उसमें प्रोस्टेट तथा सेमिनल वेसिकल की ग्रंथियों में बना जल, तेल व अन्य पदार्थ सब कुछ पहले जैसे होते हैं, उसमें केवल वीर्यकोष नहीं होते. इस तरह से नसबन्दी के बाद भी पुरुष में सेक्स के दौरान वीर्यपात होना बन्द नहीं होता.

क्योंकि पुरुष के अण्डकोष तथा वीर्य की नलकी, शरीर के बाहर, लिंग के नीचे होती हैं, पुरुष नसबन्दी का ऑपरेशन स्त्री नसबन्दी के मुकाबले बहुत अधिक आसान है.

जब लड़का किशोरावस्था में आता है, उसका शरीर टेस्टोस्टिरोन नाम का हारमोन बनाने लगता है जिससे लिंग का आकार बढ़ता है, शरीर में बाल आ जाते हैं, आवाज़ भारी हो जाती है. उस समय उसके अण्डकोष, वीर्यकोषों को बनाना प्रारम्भ करते हैं और उसका शरीर वीर्यपात के द्वारा प्रजनन के लिए तैयार हो जाता है.

वीर्यकोष में बनने वाले कोष अगर बाहर न निकलें तो अण्डकोष के अन्दर ही मर जाते हैं, लेकिन सेमिनल वेसिकल का द्रव्य जब भर जाता है तो अक्सर रात को स्वप्नदोष के रूप में कुछ कुछ दिनों में निकलता रहता है. इस तरह वीर्य का बनना और निकलना इस फैक्टरी के सही काम करने की निशानी है और प्राकृतिक बात है.

वीर्य में क्या होता है?

वीर्य की मात्रा करीब 2 से 5 मिलीलिटर होती है. इसमें 70-75 प्रतिशत तक सेमिनल वेसीकल में बना द्रव्य होता है, 20-23 प्रतिशत प्रोस्टेट में बने पदार्थ होते हैं, 1 प्रतिशत चिकनाई के पदार्थ होते हैं और करीब 2 प्रतिशत तक वीर्यकोष होते हैं. इसमें केल्शियम, क्लोराइड, फ्रुकटोज़, मेगनीशयम, पोटिशयम जैसे तत्व सूक्षम मात्रा में होते हैं, यानि पोषित खाने में पाये जाने वाले सामान्य तत्व होते हैं.

वीर्यकोष दो तरह के होते हैं - एक्स (x) क्रमोसोम वाले तथा वाई (y) क्रोमोसोम वाले. दूसरी ओर नारी के शरीर में केवल एक तरह का अँडकोष होता है, एक्स (x) क्रोमोसोम वाला. अगर माँ के एक्स क्रोमोसोम वाले अँडकोष से पिता का एक्स (x) क्रोमोसोम वाला वीर्यकोष मिलता है तो लड़की का भ्रूण बनता है. अगर माँ के एक्स (x) क्रोमोसोम से पिता का वाई (y) क्रोमोसोम  वाला वीर्यकोष मिले तो लड़के का भ्रूण बनता है. यानि बेटा होगा या बेटी, यह पिता के वीर्य पर निर्भर करता है, माँ के अँडकोष से नहीं निर्भर करता.

अगर चाहते हैं कि यौन सम्बन्धों से लड़की गर्भवती नहीं हो तो पुरुष को अपने तने हुए लिंग पर कण्डोम चढ़ाना चढ़ा कर सम्भोग करना चाहिये. कण्डोम से गर्भ रोकने के अतिरिक्त एडस तथा सिफलिस जैसे अन्य यौन रोगों से भी बचाव होता है.

स्वप्नदोष या हस्तमैथुन

रात को सोते हुए वीर्यपात होने को स्वप्नदोष कहते हैं.

किशोरों में सेमिनल वेसिकल में द्रव्य उद्पादन बहुत बढ़ा होता है, इसलिए किशोरावस्था में सोते समय वीर्यपात होना स्वाभाविक है. जब द्रव्य शरीर में भर जाता है तो आसानी से निकल जाता है. अक्सर इसके साथ सेक्स से जुड़े सपने होते हैं.

जब लड़के हस्तमैथुन सीख जाते हैं या सेक्स सम्बन्ध बनाने लगते हैं तो वीर्य द्रव्य को बाहर निकलने के लिए स्वाभाविक रास्ता मिल जाता है और स्वप्नदोष अपने आप ही बन्द हो जाता है.

उम्र के साथ, वीर्य द्रव्य का बनना कम हो जाता है, शरीर में हारमोन कम हो जाते हैं, इस तरह से यौन इच्छा कम हो जाती है और यौन सम्बन्ध न हों तो भी स्वप्नदोष बहुत कम होता है. स्वप्नदोष तथा हस्तमैथुन दोनो को ही स्वाभाविक माना जाता है. इनसे लिंग की सम्भोग शक्ति पर कुछ असर नहीं पड़ता, यह तो शरीर में जागने वाली इच्छाओं को संतुष्ट करने के सामान्य साधान हैं.

किशोर शरीर में हारमोन बढ़े होते हैं जिनकी वजह से उनके मन में यौन इच्छा व विचारों का उठना स्वाभाविक है. इस तरह के विचार खेल, वर्जिश आदि से कम हो सकते हैं, जिससे शरीर का ध्यान दूसरी ओर हो जाता है, लेकिन बिल्कुल बन्द नहीं होते. दूसरी ओर, यौन इच्छा व विचारों को बिल्कुल बन्द करने से किशोर मन में मनोवैज्ञानिक ग्रँथियाँ बन जाती है जिससे शरीर के मानसिक विकास पर गलत प्रभाव पड़ता है.

दुर्भाग्यवश, पाराम्परिक सोच में ब्रह्मचर्य तथा वीर्य संभाल कर रखने को इतना अधिक महत्व दिया गया है कि न चाहने पर भी, किशोर व युवा, स्वप्नदोष तथा हस्तमैथुन को गलत सोचते हैं और अपनी इच्छाओं को काबू या संयम न कर पाने से खुद को अपराधी महसूस करते हैं. यौन सम्बन्धों से जुड़े बहुत सारे रोग व कठिनाईयाँ इसी अपराध भावना और मानसिक डर से उपजते हैं.

शीघ्रपतन

शीघ्रपतन का अर्थ है कि सेक्स क्रिया के शुरु होते ही जल्दी से वीर्यपतन होना. ऐसे लोग सोचते हैं कि उनमें वीर्यपतन को रोकने की शक्ति नहीं और वह लम्बे समय तक सम्भोग करने की कामना रखते हैं.

पोर्नोग्राफी की फ़िल्मों में पुरुषों को 10-30 मिनट तक या इससे भी अधिक समय तक सम्भोग करते दिखलाया जाता है. यह फ़िल्में देख कर युवा सोचने लगते हैं कि, "मुझसे तो ऐसा नहीं होता यानि मुझमें कुछ कमी है या मुझे शीघ्रपतन की तकलीफ़ है".

पुरुष यौनांग (लिंग) अँदर से स्पोँज जैसे माँस से बना होता है जिसमें रक्त के भरने से लिंग तन जाता है. सम्भोग के लिए लिंग का ठीक से तनना आवश्यक है. लेकिन लिंग के तनने में मानसिक सोच का गहरा प्रभाव है, जिसकी वजह से कहते हैं सेक्स सारा दिमाग में होता है. यानि, अगर किसी तरह की चिन्ता हो, या मन में हीन भावना हो या अपराधी भावना हो या यह सोचा जाये कि मुझमें सेक्स की क्षमता कम है तो अपने आप ही लिंग का ठीक से तनना कठिन हो जाता है.

आप के लिंग में कोई सचमुच की बीमारी है या केवल मानसिक दबाव से ऐसा हो रहा है, यह समझने के लिए दो तीन दिन तक सेक्स से परहेज करिये, फ़िर देखिये कि सोते सोते या रात में उठने पर या सुबह उठने पर पिशाब करने के समय, आप का लिंग अपने आप तनता है या नहीं - अगर तनता है तो इसका अर्थ है कि लिंग तनने में कोई बीमारी नहीं, बल्कि आप की कठिनाई मानसिक दबाव या सोच की वजह से हैं.

कभी कभी, काम से जुड़ी या जीवन की अन्य चिन्ताओं से भी शीघ्रपतन की बात जुड़ सकती है.

डायबीटिज़ या हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों से, कुछ दवाओं से, या प्रोस्टेट के ऑपरेशन के बाद भी लिंग के ठीक से तनने में कठिनाई हो सकती है. अगर सचमुच की शारीरिक कठिनाई है तो डाक्टर से सलाह लीजिये. अगर बात मानसिक दबाव की है तो सोचिये की क्या आप को सचमुच शीघ्रपतन की तकलीफ़ है या आप पोर्नोग्राफ़ी फ़िल्मों से या अन्य लोगों से सुनी बातों से अपने आप से गलत अपेक्षाएँ बना रहे हैं?

अगर वीर्यपात लिंग तनने के एक मिनट के अंदर हो जाये तो उसे शीघ्रपतन माना जाता है. अगर वीर्यपात एक मिनट से अधिक अविधि के बाद हो तो उसे शीघ्रपात नहीं कहते. औसत पुरुष में वीर्यपात, सम्भोग के शुरु होने से 5 से 8 मिनट के समय में होता है.

पोर्नोग्राफ़ी की फ़िल्मों में जब पुरुषों को आधे घँटे या अधिक समय तक सम्भोग करते हुए दिखाया जाता है तो अक्सर वह एक वीर्यपात के बाद वियागरा जैसी दवाओं से लिंग को तना कर किया जाता है, या फ़िर सम्भोग के दृश्य को विभिन्न एक्टरों के साथ करके जोड़ दिया जाता है. अपने लिंग की लम्बाई को या सम्भोग करने के समय को पोर्नोग्राफ़ी फ़िल्मों के मापदँड पर तौलना बेवकूफ़ी है.

शीघ्रपात का इलाज

सेक्स का उद्देश्य आप को तथा आप के सम्भोग साथी को सुख व आनन्द देना है. सम्भोग कितना लम्बा हुआ या लिंग कितना बड़ा या मोटा है, सेक्स का आनन्द उस पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि आप में अपने साथी की ज़रुरतों को पहचानने की और उन्हे पूरा करने की क्षमता है या नहीं.

एक बार मन से यौन सम्भोग की लम्बाई की चिन्ता को छोड़ कर, कैसे साथी को यौन आनन्द के चर्म पर पहुँचायें की चिन्ता करेंगे तो शीघ्रपात की बात भूल जायेंगे. नारी सम्भोग में यौन आनन्द देने के बारे में मैंने पहले एक बार लिखा था, आप उस आलेख को फ़िर से पढ़ सकते हैं.

सम्भोग की अविधि बढ़ाने के लिए कई तरह के उपाय बताये जाते हैं, जैसे कि कण्डोम पहनना या ज़ाइलोकेन (Xylocaine jelly) जैसी एनिस्थेटिक क्रीम लगाना जिससे लिंग को स्पर्श की अनुभूति कम हो. एक अन्य उपाय है सम्भोग के पहले हस्तमैथुन करना और आवश्यकता पड़ने पर वियाग्रा जैसे दवाई की सहायता से सम्भोग करना.

मेरे विचार में यह उपाय उतना काम नहीं करते क्योंकि सेक्स लिंग की अनुभूति से अधिक हमारे दिमाग में क्या है, उस पर अधिक निर्भर करता है. जब तक मन में चिन्ता रहेगी, कुछ अन्य उपाय काम नहीं करेंगे. मेरी सलाह है कि सेक्स सम्बन्धी चिन्ता घटाने के लिए मानसिक डीकन्डीशनिंग करिये जिसका एक तरीका नीचे बता रहा हूँ.

यौन सम्बन्ध बेहतर करने के लिए मानसिक सोच को सुधारना

मानसिक डीकन्डीशनिंग का एक तरीका है जिसका उद्देश्य है अपने साथी के साथ मिल कर, एक दूसरे के शरीर को जानना तथा भीतरी अनुभूतियों को समझना. इससे आत्मविश्वास बढ़ता है, यौन साथियों में आत्मीयता बढ़ती है तथा यौन सम्बन्धों में सुधार होता है.

इसके लिए पहले तीन दिनों तक सोते समय अपने साथी से सट कर लेटिये, बस एक ही शर्त है कि कुछ भी हो जाये, आप हाथों से एक दूसरे के यौन अंगों को नहीं छूएगें और सम्भोग करने की कोशिश नहीं करेंगे. न पुरुष को वीर्यपात हो, न नारी को यौनान्द का चर्म मिले. हो सके तो इसे निर्वस्त्र हो कर या कम वस्त्र पहन कर कीजिये. इन तीन दिनों में आप को एक दूसरे के यौन अंगो को छोड़ कर शरीर के विभिन्न हिस्सों में क्या अनुभूतियाँ होती हैं, उन्हें समझना व जानना है. मन में चाहे जितनी भी यौन आनन्द या सम्भोग की इच्छा उठे, उस पर ध्यान नहीं दीजिये. बल्कि यह समझने की कोशिश कीजिये कि यौन इच्छा के साथ शरीर के विभिन्न भागों में किस तरह की अनुभूतियाँ उठती हैं. उस समय अपने मन में क्या विचार आते हैं, उन्हें अपने साथी से बाँटिये.

तीन दिनों के बाद, अगले तीन दिनों तक, बिना सम्भोग के, आप को एक दूसरे को यौन आनन्द के चर्म तक ले जाना है. चाहे वह हाथों के सहारे करिये, चाहे मुँह के, चाहे शरीर के किसी अन्य अंग की सहायता से, बस अपने यौन अंगों को आपस में नहीं छूने दीजिये. इन तीन दिनों में आप का ध्येय है बिना सम्भोग के यौन आनन्द कैसे होता है, इसे समझना, एक दूसरे के शरीर को जानना कि शरीर के कौन से हिस्से में यौन अनुभूतियाँ होती हैं, किस अनुभूति से आप को तथा आप के साथी को अधिक आनन्द मिलता है. सेक्स में कोई जबरदस्ती नहीं होनी चाहिये, हर बात दोनो की मर्ज़ी से होनी चाहिये,

सातवें दिन के बाद आप पूर्ण सम्भोग कर सकते हैं. अगर आप को लगे कि शीघ्रपतन की बात में पूरा सुधार नहीं हुआ तो छहः दिन की डीकन्डीशनिंग को दोबारा से करिये.

निष्कर्श

पुरुष यौनता के साथ बहुत सी चिन्ताएँ जुड़ी हैं. इन चिन्ताओं की वजह से पुरुष के मन में अक्सर डर आ जाता है जो शीघ्रपत्न या स्वप्नदोष जैसी समस्याओं को बना देता है.

इन समस्याओं के एक बड़ा कारण है यौन अंगो तथा क्रिया के बारे में सही जानकारी का न होना. पराम्परिक सोच का भी, जैसे कि वीर्य को अमूल्य मानना या हस्तमैथुन को गलत सोचना, मानसिक चिन्ता बना सकते हैं जिनसे शरीर की यौन शक्ति पर गलत प्रभाव पड़ता है.

मन से चिन्ता को हटाना और अपने सेक्स साथी के साथ अपने शरीर को जानना और अपनी इच्छाओं को समझना, इससे सेक्स सम्बन्धी समस्याओं का निदान हो सकता है. इसमें डीकन्डीनिंग जैसे तरीकों से मदद मिल सकती है.

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नारी और यौन सुख

पहले भी कई बार सेक्स सम्बँधी विषयों पर लिख चुका हूँ, लेकिन इस विषय पर कुछ भी लिखने की सोचूँ तो हर बार मेरे बचपन में सीखे भद्रता-अभद्रता या शालीनता-अश्लीलता के पाठ हर बार मन में कुछ दुविधा सी कर देते हैं कि क्या इन बातों पर चिट्ठे जैसे माध्यम पर लिखना ठीक होगा? फ़िर सोचता हूँ कि इस विषय पर स्पष्ट सरल भाषा में जानकारी मिलना इतना कठिन है कि भद्रता-अभद्रता की बात सोच कर रुकना गलत होगा.

यौन विषयों पर लिखे मेरे आलेख मेरे चिट्ठे के सबसे अधिक पढ़े जाने वाले आलेखों में से हैं, हालाँकि मेरे विचार में इन पन्नों पर कुछ विषेश शब्दों को खोजते हुए जो लोग गलती से आ जाते हैं शायद उन्हें वह नहीं मिलता जिसकी वे आशा कर रहे होते हैं! दूसरी ओर, मुझे इन विषयों पर नियमित रूप से ईमेल के संदेश भी मिलते रहते हैं. यह संदेश अधिकतर पुरुषों के होते हैं या अंतरलैंगिकता के विषय पर होते हैं, जो मुझसे अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के बारे में सलाह माँगते हैं. तब कुछ हैरानी सी होती है जब नवयुवक यौन सम्बंधों के बारे में पूछते हैं, सोचता हूँ कि इस सदी में जब ईंटरनेट पर इस विषय पर इतनी जानकारी भरी पड़ी है, तो भी यह लोग किस तरह की बातों के बारे में चिन्तित होते रहते हैं!

मेरी समझ में भारतीय नवयुवकों की इस चिन्ता में उस भारतीय पाराम्परिक सोच का बड़ा हाथ है जिसके अनुसार पुरुष का वीर्य सम्भाल कर रखना चाहिये, उसको खोने से उनका पौरुष खो जाता है या कम हो जाता है. पढ़े लिखे, पोस्टग्रेजूएट लोग जब लड़कपन के हस्तमैथुन करने और उसके परिणाम स्वरूप शरीर में आयी कमज़ोरी और होने वाले विवाह के बारे में चिन्ता व्यक्त करते हैं कि अगर वे अपनी पत्नी के साथ यौन सम्बँध बना पाने में असमर्थ हुए तो क्या होगा, तो आश्चर्य होता है. सोचता हूँ कि यह लोग किस दुनिया में रहते हैं, क्या इन्होंने वियाग्रा जैसी गोलियों के बारे में भी नहीं सुना?

वैसे तो मेरे विचार में वियाग्रा का इस तरह का प्रयोग केवल मानसिक ग्रँथियों को छुपाता है. इस सोच की असली वजह इन नवयुवकों की मानसिक चिन्ता और घुट्टी में मिली सोच है कि ब्रह्मचर्य से शरीर तँदरुस्त होता है और हस्तमैथुन उसे कमज़ोर करता है. नवयुवकों में यौन सम्बंधों से जुड़ी बीमारियों के बारे में और कैसे कण्डोम के प्रयोग से कई यौन रोगों से बचा जा सकता है, की जानकारी की भी बहुत कमी है. इंटरनेट पर पोर्नोग्राफ़ी से व ब्लू फ़िल्मों से नर-नारी के बीच के सहज यौन सम्बँधों की समझ के बदले, सेक्स के बारे में एकतरफ़ा बिगड़ी समझ मिलती है जिससे नवयुवक सोचते हैं कि पुरुष के लिँग के आकार से या नारी को पीड़ा देने से या हिँसक यौन सम्बँध बनाने से अच्छा सेक्स होता है.

नारी का शरीर और यौन अंग क्या होते हैं, नारी को यौन सुख किस तरह से मिलता है, या पुरुष और नारी के बीच कैसे एक दूसरे को यौन संतुष्टी दे सकते हैं इसकी समझ अक्सर लोगों को नहीं होती. मेरे विचार में यह बात केवल नौसिखिया नवयुकों की नहीं है, बल्कि अक्सर विवाहित या अनुभवी पुरुषों में भी यह समझ पूरी नहीं होती. दूसरी ओर, स्त्रियों में भी अपने शरीर के बारे में पूरी समझ नहीं होती.

कुछ मास पहले नारी यौन सुख के विषय पर अमरीका के सियेटल के एक अखबार में स्तंभ लिखने वाले डेन सेवेज (Dan Savage) का एक आलेख पढ़ा था जिसमें उन्होंने नारी यौन सुख क्या होता है उसके बारे में बहुत स्पष्ट और दो टूक शब्दों में लिखा था. डेन स्वयं समलैंगिक हैं पर उनके आलेख समलैंगिकता या विषमलैंगिकता के दायरों से बाहर निकल कर, शरीर, यौनता और सेक्स विषयों को बहुत स्पष्ट तरीके से छूते हैं.

नारी यौन सुख के बारे में उन्हें एक पुरुष का पत्र मिला था जिसमें पूछा गया था कि वह सम्भोग द्वारा अपनी प्रेमिका को यौन सुख का चर्म नहीं दे पाता था और उसने डेन से सलाह माँगी थी. अपने आलेख में डेन ने इस प्रश्न का उत्तर दिया था (अंग्रेज़ी के आलेख के कुछ हिस्सों का हिन्दी में मेरा अनुवाद है):

"सम्भोग से पहले तुम्हें नारी शरीर के बारे में जानना चाहिये. अधिकतर औरतों को केवल सम्भोग से यौन सुख का चर्म (ऑरगेज़्म) नहीं मिलता. क्योंकि नारी शरीर में यौन अनुभूति में क्लाइटोरिस (यानि यौनिद्वार के पास का उठा हुआ हिस्सा जो पुरुष लिंग जैसे माँस से बना होता है) का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है जैसे कि पुरुष के यौन सुख में उसके लिंग का सबसे महत्वपूर्ण स्थान होता है. अगर सम्भोग में क्लाटोरिस को सही तरह से अनुभूति नहीं मिलेगी तो नारी को यौन सुख कैसे मिलेगा? क्लाइटोरस यौनी के बाहर होती है, यौनी के अन्दर नहीं. तुम्हारा लिंग कितना भी बड़ा या तना हुआ क्यों न हो, अगर तुमने क्लाइटोरिस को नहीं छुआ तो बात नहीं बनेगी.
कुछ औरतों में क्लाइटोरिस इस कोण पर बना होता है कि सम्भोग के दौरान, उसे अपने आप रगड़न मिलती है, इस तरह से उन्हें केवल सम्भोग से पूरा यौन सुख मिल जाता है. पर अगर उनका क्लाइटोरिस ऐसे कोण वाला नहीं है तो कितनी देर भी सम्भोग करोगे, उन्हें यौन सुख नहीं मिलेगा.
70 प्रतिशत औरतों को सम्भोग के साथ साथ क्लाइटोरिस की अतिरिक्त अनूभूति चाहिये तभी वह यौन सुख के चर्म को अनुभव कर सकती हैं. तुम सोचो कि अगर तुम्हारी प्रेमिका तुम्हारे लिंग को केवल पैर से कभी कभी छू ले, और तुम्हें अन्य कुछ न करने दे तो क्या तुम्हें यौन सुख मिलेगा और क्या तुम इसे स्वीकार करोगे? तो तुम्हारी प्रेमिका इसे क्यों स्वीकारे कि तुम उसको यौन की सबसे अच्छी अनुभूति देने वाले उसके अंग को भूल जाओ?"
क्लाइटोरिस शरीर कें कहाँ पर होती है यह आप विकीपीडिया के पृष्ठ पर चौथे नम्बर की तस्वीर में देख सकते हैं जिसमें 1 नम्बर पर क्लाटोरिस के ऊपर की चमड़ी और 2 नम्बर पर क्लाइटोरिस को दिखाया गया है. 3 नम्बर पर यूरिथ्रा यानि मूत्र द्वार है और 4 नम्बर पर यौनी का द्वार.

हिन्दी के विकीपीडिया पर क्लाइटोरिस के बारे में जानकारी तो है लेकिन उस पृष्ठ पर तस्वीरें नहीं हैं. हिन्दी में क्लाइटोरस को भगशिश्न, भंगाकुर, भगनासा आदि कहते हैं लेकिन शायद इन शब्दों को समझने वाले लोग कम ही होंगे.

इस विषय पर हिन्दी में खोजा तो एक वेबपृष्ठ मिला जिसके अनुसार क्लाइटोरिस की अनुभूति की इच्छा केवल लेस्बियन युवतियों को होती है, इस तरह से इंटरनेट पर कुछ गलत जानकारी भी मिलती है.

अगर आपने यौन विषय पर खुल कर कभी बात नहीं की तो झिकझिकाहट हो सकती है लेकिन मैं मानता हूँ कि यौनसुख मानव जीवन के सबसे अमूल्य अनुभवों में से है, इसलिए अपने शरीर को समझना, अपनी इच्छाओं व आकांक्षाओं को पूरा करना बहुत आवश्यक है!

मेरा व्यक्तिगत विचार है कि पति-पत्नि या प्रेमी-प्रेमिका के बीच में वह सब कुछ जायज़ है जिसे वह दोनो स्वतंत्रता से स्वीकार करते हैं और जिससे उन्हें आनन्द मिलता है. प्रेम और सेक्स में जबरदस्ती की कोई जगह नहीं, अगर कोई बात एक साथी को मान्य नहीं तो उसकी सेक्स में कोई जगह नहीं होनी चाहिये! पर साथ ही मेरा मानना है कि बिना आपसी प्रेम और स्नेह के सेक्स में सुख नहीं केवल खालीपन है, लेकिन शायद इस बारे में मेरे विचार कुछ पुराने तरीके हैं!

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हिन्दी में समलैंगिकता विषय पर लेखन


प्रोफेसर अलेसाँद्रा कोनसोलारो उत्तरी इटली में तोरीनो (Turin) शहर में विश्वविद्यालय स्तर पर हिन्दी की प्रोफेसर हैं. उन्होंने बात उठायी मेरे एक 2007 में लिखे आलेख की जिसमें मैंने हिन्दी पत्रिका हँस में तीन हिस्सों में छपी हिन्दी के जाने माने लेखक पँकज बिष्ट की कहानी "पँखोंवाली नाव" की बात की थी. अलेसाँद्रा ने मुझसे पूछा कि क्या यह कहानी कहीं से मिल सकती है? इस कहानी में दो मित्र थे, जिनमें से एक समलैंगिक था. मैंने अपने आलेख में एक ओर तो बिष्ट जी द्वारा समलैंगिकता के विषय को छूने का साहस करने की सराहना की थी, वहीं मुझे यह भी लगा था कि इस कहानी में समलैंगिकता को "बाहर" या "विषमलैंगिक" दृष्टि से देखा सुनाया गया है, उसमें कथा के समलैंगिक पात्र के प्रति आत्मीयता कम है.

जहाँ तक मुझे मालूम है, बीच में कुछ समय तक हँस में छपी सामग्री इंटरनेट पर भी मिल जाती थी, लेकिन बहुत समय यह बन्द है. मेरे पास 2007 के हँस के कुछ अंक हैं लेकिन यह कहानी पूरी नहीं है, उसका बीच का भाग जो सितम्बर 2007 के हँस में छपा था, वह नहीं है. क्या आप में कोई सहायता कर सकता है या कोई तरीका है सितम्बर 2007 अंक से इस कहानी को पाने का? अगर किसी के पास हँस का वह अंक हो तो उसे स्कैन करके मुझे भेज सकता है.

अलेसाँद्रा के कुछ अन्य प्रश्न भी थे - हिन्दी में समलैंगिकता-अंतरलैंगिकता के विषय पर कौन सी महत्वपूर्ण कहानियाँ और उपन्यास हैं? हिन्दी में समलैंगिक या अंतरलैंगिक लेखक या लेखिकाएँ हैं? अगर हाँ तो वह इस विषय पर क्या लिख रहे हैं?

अलेसाँद्रा के इन प्रश्नों का मेरे पास कोई उत्तर नहीं. इंटरनेट पर खोजने से कुछ नहीं मिला. क्या आप में कोई इस विषय में हमारी सहायता कर सकता है यह जानकारी एकत्रित करने के लिए कि इस विषय पर किस तरह का लेखन हिन्दी में है और हो सके तो उनके लेखकों से सम्पर्क कराने के लिए?

Queer writing - graphic by S. Deepak, 2013

पिछले दशकों में लेखन और साहित्य विधाओं में सच्चेपन (authenticity) और "जिसकी आपबीती हो वही अपने बारे में लिखे" की बातें उठी हैं. इस तरह से साहित्य में नारी लेखन, शोषित जनजातियों के लोगों के लेखन, दलित समाज के लोगों के लेखन, जैसी विधाएँ बन कर मज़बूत हुई हैं. इन्हीं दबे और हाशिये से बाहर किये गये जन समूहों में समलैंगिक तथा अंतरलैंगिक व्यक्ति समूह भी हैं, जिनके लेखन की अलग साहित्यिक विधा बनी गयी है जिसे अंग्रेज़ी में क्वीयर लेखन (Queer writings) कहते हैं. शब्दकोश के अनुसार "क्वीयर" का अर्थ है विचित्र, अनोखा, सनकी या भिन्न. यानि अगर बात लोगों के बारे में हो रहे हो तो इसका अर्थ हुआ आम लोगों से भिन्न. लेकिन अँग्रेज़ी में "क्वीयर" का आधुनिक उपयोग "यौनिक भिन्नता" की दृष्टि से किया जाता है. तो इस तरह के लेखन को बजाय "समलैंगिक-अंतरलैंगिक लेखन" कहने के बजाय हम "यौनिक भिन्न लेखन" भी कह सकते हैं. पश्चिमी देशों में विश्वविद्यालय स्तर पर जहाँ साहित्य की पढ़ायी होती है, तो उसमें साहित्य के साथ साथ, नारी लेखन, जनजाति लेखन, यौनिक भिन्न लेखन, विकलाँग लेखन, जैसे विषयों की पढ़ायी भी होती है.

नारी लेखन, दलित या जन जाति लेखन जैसे विषयों पर मैंने हँस जैसी पत्रिकाओं में या कुछ गिने चुने ब्लाग में पढ़ा है. लेकिन हिन्दी में विकलाँगता लेखन या समलैंगिक लेखन, इसके बारे में नहीं पढ़ा.

बहुत से लोग, लेखकों और लेखन को इस तरह हिस्सों में बाँटने से सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि लेखन केवल आपबीती नहीं होता, कल्पना भी होती है. अगर हम यह कहने लगें कि लेखक केवल अपनी आपबीती पर ही लिखे तो दुनिया के सभी प्रसिद्ध लेखकों का लिखना बन्द जाये. खुले समाज में जहाँ जन समान्य निर्धारित करे कि जो आप ने लिखा है वह पढ़ने लायक है या नहीं, उसे लोग खरीद कर पढ़ना चाहते हें या नहीं, यही लेखन की सार्थकता की सच्ची कसौटी है.

दूसरी ओर यह भी सच है कि समाज के हाशिये से बाहर किये और शोषित लोगों की आवाज़ों को शुरु से ही इतना दबाया जाता है कि वह आवाज़ें मन में ही घुट कर रह जाती हैं, कभी निकलती भी हैं तो इतनी हल्की कि कोई नहीं सुनता. आधा सच जैसे प्रयास भी अक्सर हर ओर से चारदीवारियों में घेर कर बाँध दिये जाते हैं जिन पर उन चारदीवारों से बाहर चर्चा न के बराबर होती है. इस स्थिति में यौनिक भिन्न लेखन की बात करके उन आवाज़ों को पनपने और बढ़ने का मौका देना आवश्यक है. जब उन आवाज़ों में आत्मविश्वास आ जाता है तो वह खुले समाज में अन्य लेखकों की तरह सबसे खुला मुकाबला कर सकती हैं.

रुथ वनिता तथा सलीम किदवाई द्वारा सम्पादित अँग्रेज़ी पुस्तक "भारत में समलैंगिक प्रेम - एक साहित्यिक इतिहास" ("Same sex love in India - a literary history" edited by Ruth Vanita and Saleem Kidwai, Penguin India, 2008) कुछ आधुनिक लेखकों की रचनाओं की बात करती है.

रुथ से मैंने पूछा कि अगर कोई लेखक जो स्वयं को समलैंगिक/द्विलैंगिक/अंतरलैंगिक न घोषित करते हुए भी यौनिक भिन्नता के बारे में लिखें तो क्या उसे "यौनिक भिन्न साहित्य" माना जायेगा?

तो रुथ ने कहा कि "यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि आप "क्वीयर" को किस तरह परिभाषित करते हैं? मेरे विचार में इस विषय पर कोई भी लिखे, चाहे वह स्वयं को यौनिक रूप से भिन्न परिभाषित करे या न करे, वह स्वीकृत होगा. किसकी यौनता क्या है, यह हम कैसे जान सकते हैं? इस विषय पर बहुत से हिन्दी लेखकों ने लिखा है जैसे कि राजेन्द्र यादव,निराला, उग्र तथा विषेशकर, विजयदान देथा जिन्होंने राजस्थानी में लिखा, उस सब को "समलैंगिक साहित्य" कह सकते हैं. चुगताई का लिखा जैसे कि "तेरही लकीर" के हिस्से और "लिहाफ़" भी इसी श्रेणी में आता है, हालाँकि यह उर्दू में लिखे गये. हरिवँश राय बच्चन की आत्मकथा, "क्या भूलूँ क्या याद करूँ" में वह भाग है जिसके बारे में नामवर सिंह ने कहा था कि वह एक पुरुष का दूसरे पुरुष के लिए प्रेम की स्पष्ट घोषणा थी."

यह जान कर अच्छा लगा कि हिन्दी-उर्दू जगत में जाने माने लेखकों ने इस विषय को छूने का साहस किया है, आज से नहीं, बल्कि कई दशकों से यह हो रहा है. लेकिन मैंने सोचा कि रूथ के दिये सभी उदाहरण कम से कम 1960-70 के दशक से पहले के हैं. जबकि मुझे अपने प्रश्न का उत्तर नहीं मिला कि, पिछले तीस चालिस सालों में यौनिक भिन्नता की दृष्टि से, पँकज बिष्ट की हँस में छपी कहानी "पँखवाली नाव" के अतिरिक्त क्या कुछ अन्य लिखा गया?

इस बहस में एक अन्य दिक्कत है जो कि साँस्कृतिक है और मूल सोच के अन्तरों से जुड़ी हुई है. पश्चिमी विचारक, कोई भी विषय हो, चाहे विज्ञान या दर्शन, वनस्पति या मानव यौन पहचान, वे हमेशा हर वस्तु, हर सोच को श्रेणियों में बाँटते हैं. जबकि भारतीय परम्परा के विचारक में हर वस्तु, हर सोच में समन्वय की दृष्टि देखते हैं. इस तरह से बहुत से यौनिक मानव व्यवहार हैं जिन्हें भारतीय समाज ने समलैंगिक-अंतरलैंगिक-द्वीलैंगिक श्रेणियों में नहीं बाँटा. जैसे कि महाभारत में चाहे वह शिखण्डी के लिँग बदलाव की कथा हो या अर्जुन का वर्ष भर नारी बन के जँगल घूमना हो, इन कथाओं में परम्परागत भारतीय विचारकों ने यौनिक भिन्नता की परिभाषाएँ नहीं खोजीं. तो सँशय उठता है कि हिन्दी में "क्वीयर साहित्य" की पहचान करना, भारतीय सोच और दर्शन को पश्चिमी सोच के आईने में टेढ़ा मेढ़ा करके बिगाड़ तो नहीं देगा?

इसी भारतीय तथा पश्चिमी सोच के अन्तर के विषय पर एक अन्य उदाहरण श्री अमिताव घोष की अंगरेज़ी में लिखी पुस्तक "सी आफ पोप्पीज़" (Sea of poppies) है जिसमें एक पात्र हैं बाबू नबोकृष्णो घोष जो तारोमयी माँ के भक्त हैं और इसी भक्ति में लीन हो कर स्वयं को माँ तारोमयी का रूप समझते हैं. इस पात्र की कहानी को केवल अंतरलैंगिकता या समलैंगिकता के रूप में देखना, उसकी साँस्कृतिक तथा आध्यात्मिक जटिलता का एकतरफ़ा सरलीकरण होगा जिससे पात्र को केरिकेचर सा बना दिया जायेगा. इसलिए भारतीय भाषाओं में "क्वीयर लेखन" की बहस में इस बात पर ध्यान रखना भी आवश्यक है.

जैसे रुथ ने कहा कि कोई भी इस विषय पर अच्छा लिखे, तो अच्छी बात है और उसे सराहना चाहिये. लेकिन मेरी नज़र में यह उतना ही महत्वपूर्ण कि स्वयं को "यौनिक भिन्न" स्वीकारने वाले लोग भी लिखें. भारतीय समाज ने अक्सर इस दिशा में बहुत संकीर्ण दृष्टिकोण लिया है. इस सारी बहस को अनैतिक, गैरकानूनी व अप्राकृतिक कह कर समाज ने लाखों व्यक्तियों को शर्म और छुप छुप कर जीने, अन्याय सहने, घुट घुट कर मरने के लिए विवश किया है. पिछले दशक में इस बारे में कुछ बात खुल कर होने लगी है. ओनीर की "माई ब्रदर निखिल" और "आई एम" जैसी फ़िल्मों ने इस बहस को अँधेरे से रोशनी में लाने की कोशिश की है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध लेखक विक्रम सेठ ने अपने द्विलैंगिक होने के बारे में लिखा है. इस तरह से अगर यौनिक भिन्न लोग अपनी भिन्नता को स्वीकारते हुए लिखेंगे तो इस विषय को शर्म और अँधेरे में छुपे रहने से बाहर निकलने का रास्ता मिलेगा.

आज की दुनिया में अपने विचार अभिव्यक्त करने के लिए ब्लाग सबसे आसान माध्यम है. बड़े शहरों में और अंग्रेज़ी बोलने वाले युवक युवतियों ने ब्लाग की तकनीक का लाभ उठा कर "भिन्न यौनिक" ब्लाग बनाये हैं, जैसे कि आप इन तीन उदाहरणों में देख सकते हैं -  एक, दो, तीन.

जहाँ तक मुझे मालूम है, हिन्दी का केवल एक चिट्ठा है "आधा सच" जिसपर कुछ किन्नर या अंतरलैंगिक व्यक्ति अपनी बात कहते हैं. क्या इसके अतिरिक्त क्या कोई अन्य हिन्दी, मैथिली, भोजपुरी, अवधी, राजस्थानी आदि में इस तरह के अन्य चिट्ठे हैं? क्या स्थानीय स्तरों पर भारत के छोटे शहरों में, कस्बों में भी इस विषय पर लोगों ने कुछ लिखने की हिम्मत की है? क्या कुछ अंडरग्राइड पत्रिकाएँ या किताबें छपी हैं इस विषय पर?

यह नहीं कि चिट्ठों पर इस विषय पर लिखने मात्र से वह "यौनिक भिन्न" साहित्य हो जायेगा. साहित्य होने के लिए उसे साहित्य के मापदँडों पर भी खरा उतरना होगा, लेकिन शायद उन्हें शुरुआत की तरह से तरह से देखा जा सकता है जहाँ कल के "यौनिक भिन्न" साहित्य जन्म ले सकते हैं.

अगर आप के पास इस बारे में कोई जानकारी है तो कृपया मुझसे ईमेल से सम्पर्क कीजिये या नीचे टिप्पणीं छोड़िये. इस सहायता के लिए आप को पहले से ही मेरा धन्यवाद.

आप मुझसे ईमेल के माध्यम से सम्पर्क कर सकते हैं. मेरा ईमेल पता है sunil.deepak(at)gmail.com (ईमेल भेजते समय "(at)" को हटा कर उसकी जगह "@" को लगा दीजिये)

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मानव और पशु

सुबह बाग में अपने कुत्ते के साथ सैर कर रहा था तो अचानक दूर से कुछ कुत्तों के भौंकने और लोगों के चिल्लाने की आवाज़ सुनायी दी. आगे बढ़ने पर दो आदमी ऊँची आवाज़ में बहस करते दिखे, दोनो के हाथ में उनके कुत्तों की लगाम थी जिसे वह ज़ोर से खींच कर पकड़े थे. दोनो कुत्ते बड़े बुलडाग जैसे थे, और एक दूसरे की ओर खूँखार दाँत निकाल कर गुर्रा रहे थे. हमारा कुत्ता छोटा सा है और बहुत बूढ़ा भी. डर के मारे मैं वापस मुड़ गया, यह सोच कर कि दूसरी ओर सैर करना बेहतर होगा.

मुझे वापस आता देख कर एक सज्जन जिनसे अक्सर बाग में दुआ सलाम होता रहता है और जिनकी छोटी कुत्तिया हमारे कुत्ते से भी छोटी है, मुस्करा कर बोले, "कुत्ते में टेस्टोस्टिरोन का हारमोन होता है, उससे वह अपने आप पर काबू नहीं रख पाते. कुत्तिया देखते हैं तो उस पर तुरंत डोरे डालने की कोशिश करते हैं और दूसरे कुत्तों से लड़ाई करते हैं. अब जब कुत्ता पाला है तो यह तो होगा ही, इसमें लड़ने की क्या बात है? यह तो कुत्तों की प्रकृति है. अगर कुत्तों का आपस में लड़ना पसंद नहीं है तो या तो उनका आपरेशन करके उनके अन्डकोष निकलवा दो, इससे टेस्टोस्टिरोन बनना बन्द हो जायेगा, और वे शाँत हो जायेंगे. कुत्ते का आपरेशन  नहीं कराना तो कुत्ता पालो ही नहीं, कुत्तिया रखो."

मैं उनकी बात पर देर तक सोचता रहा. टेस्टोस्टिरोन हारमोन सभी स्तनधारी जीवों में, विषेशकर हर जीव जाति के नरों में होता है. यह हारमोन माँसपेशियों का विकास करता है, शरीर में बाल उगाता है, आवाज़ को भारी करता है. सम्भोग की इच्छा और सम्भोग क्रिया में नर भाग निभाने की क्षमता भी इसी हारमोन से जुड़ी हैं.

यही सोच कर मन में यह बात आयी कि हमारे समाजों में जब किसी युवती को पुरुष मारता है, या उससे ब्लात्कार करता है तो अक्सर लोग कहते हैं कि यह इसलिए हुआ क्यों कि उस लड़की ने उस पुरुष को कुछ ऐसा किया जिससे वह अपने पर काबू नहीं कर पाया. इसके लिए वे दोष देते हैं लड़की को, कि लड़की रात को अकेली बाहर गयी, या उसने पश्चिमी वस्त्र पहने थे या छोटे वस्त्र पहने या वह ज़ोर से हँस रही थी.  यानि उनका सोचना है कि चूँकि नर में टेस्टोस्टिरोन है इसलिए यह उसकी प्रकृति है कि जब मादा उसे आकर्षित करेगी तो वह अपने आप पर काबू नहीं कर पायेगा और उस पर हमला करेगा. इसलिए हमारे समाज लड़कियों को अपने शरीरों को चूनर, घूँघट या बुर्के में ढकने की सलाह देते हैं, कहते है कि बिना पुरुष के अकेली बाहर न जाओ, आदि.

Graphic - man attacking woman


शायद इसी बात को सोच कर बहुत से देशों में युवा लड़कियों के यौन अंगो को काट कर सिल दिया जाता है, या उन्हें शरीर ढकने, घर से बाहर न जाने की सलाह दी जाती है, ताकि उनके मन में यौन भावनाएँ न उभरें. शायद इसी वजह से हमारे समाजों ने रीति रिवाज़ बनाये जैसे कि विधवा युवती का सर मूँड दो, उसे सफ़ेद वस्त्र पहनाओ, उसे खाने में तीखे स्वाद वाली कोई चीज़ न दो, जिससे उसे न लगे कि वह जीवित है और उसकी भी कोई शारीरिक इच्छा हो सकती है. इस सब से युवती का आकर्षण कम होगा और अपने पर काबू न रख पाने वाले पुरुष उस पर हमला नहीं करेंगे.

यानि हमारे समाजों ने पुरुषों को पशु समान माना और यह माना कि उनमें किसी युवती को देख कर अपने आप को रोक पाने की क्षमता नहीं हो सकती. इस तरह से हमारे समाजों ने एक ओर "पुरुष अपनी प्रकृति पर काबू नहीं कर सकते" वाले नियम बनाये, जिससे स्वीकारा जाता है कि पुरुष शादी से पहले या विवाह के बाहर भी शारीरिक सम्बन्ध बना सकता है या कई औरतों से विवाह कर सकता है. दूसरी ओर नियम बनाये कि "नारी का अपनी प्रकृति को काबू में रखना ही नारी धर्म है", जिससे निष्कर्ष निकलता है कि अगर पुरुष कुछ भी करता है तो इसमें गलती हमेशा नारी की ही मानी जायेगी.

यानि यह समाज पुरुष को अन्य पशुओं की तरह देखता है, यह नहीं मानता कि परिवार की शिक्षा, समाज की सभ्यता और अपने दिमाग से पुरुष अपना व्यवहार स्वयं तय करता है.

पर इस तरह की सोच हमारे ही समाजों में क्यों बनी हुई है? जैसे यूरोप, अमरीका, ब्राज़ील आदि में समय के साथ बदल गयी है, वैसे हमारे समाजों में क्यों नहीं बदली? यूरोप, ब्राज़ील में आप समुद्र तट पर जाईये आप छोटी बिकिनी पहने या खुले वक्ष वाली युवतियाँ देख सकते हैं, उन पर वहाँ के पुरुष हमला क्यों नहीं करते? शायद यहाँ के पुरुषों में टेस्टोस्टिरोन की कमी है? लेकिन इन देशों में भारत, पाकिस्तान, अरब देशों आदि से आने वाले प्रवासी पुरुष क्यों नहीं इन युवतियों पर हमले करते, क्या यहाँ के कानून से डरते हैं या शायद यहाँ आने से उनके टेस्टोस्टिरोन भी कम हो जाते हैं?

आप ही बताईये क्या हम पुरुष पशु समान होते हैं क्योंकि हमे अपने पर काबू करना नहीं आता? मेरे विचार में यह सब बकवास है.

कुछ पुरुष मानसिक रोगी हो सकते हैं जिन्हें सही गलत का अंतर न मालूम हो. पर यह सोचना कि सभी पुरुष पशु होते हैं, उन्हें अपने शरीरों पर, अपने कर्मों पर काबू नहीं, यह मैं नहीं मानता. पुरुष किसी भी युवती पर हमला कर सकते हैं, इसलिए युवतियों को शरीर ढकना चाहिये, घर से अकेले नहीं निकलना चाहियें, शर्मा कर, छिप कर रहना चाहिये, मेरे विचार में यह सब गलत है.

जो लोग इसे स्वीकारते हैं, वह मानव सभ्यता को नकारते हैं, इस बात को नकारते हैं कि भगवान ने हमें दिमाग भी दिया है, केवल हारमोन नहीं दिये. मुझे लगता है कि इस तरह की सोच पुरुषों को बचपन से ही यह सिखाती है कि जो मन में आये कर लो, हमें औरतों को दबा कर रखना है. इसके लिए हमारे समाज धर्म, संस्कृति और परम्पराओं का सहारा लेते हैं इस तरह की सोच को ठीक बताने के लिए.

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शरीर की प्यास


रानी मुखर्जी की नयी फ़िल्म "अईय्या" का एक गाना देखा तो एक पुरानी बात याद आ गयी.

करीब 35 वर्ष पहले की बात है, मेरे क्लिनिक में एक महिला आयीं. पचास या बावन की उम्र थी उनकी. उनकी समस्या थी कि उनके पति में आध्यात्म योग का वैराग्य जागा था. वह अपने शरीर पर और इच्छाओं पर संयम रखना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने अपनी पत्नि से शारीरिक सम्बन्ध न रखने का फैसला किया था. उन महिला का कहना था कि वह इस बात से बहुत दुखी थीं और पति का समीप न होना उन्हें बहुत कष्ट देता था. वह बोली, "मेरे शरीर की भी तो प्यास है, मुझे अपने पति से सम्बन्ध चाहिये, उनका सामिप्य चाहिये, मैं क्या करूँ?"

उन महिला के पति मुझे बहुत मानते थे इसलिए वह चाहती थीं कि मैं उनके पति से कहूँ कि वह इस तरह से पत्नी से सब सम्बन्ध न तोड़ें. मैंने उस समय तो उनसे कहा कि हाँ मैं आप के पति से इस विषय में बात करूँगा. लेकिन मन ही मन में कुछ हड़बड़ा गया था.

रात को मैंने अपनी पत्नि से इसके बारे में सलाह माँगी. मेरी पत्नि का कहना था कि नारी जब पति का सामिप्य चाहती है तो बात केवल शारीरिक सम्बन्धों की नहीं है, बल्कि नारी के लिए वह तो इसका केवल एक हिस्सा है. नारी के सामिप्य की चाह में एक अन्य भाग होता है मानसिक सामिप्य का, एक दूसरे को छूने का, यह जताने का और कहने का कि तुम मेरे लिए प्रिय हो. इसलिए मेरी पत्नी के अनुसार मुझे उन महाशय से कहना चाहिये था कि अगर वे अपने आध्यात्मिक व्रत के कारण अपनी पत्नि से शारीरिक सम्बन्ध न भी रखना चाहें, तो कम से कम मानसिक रूप से उन्हें अपनी पत्नि के करीब होना चाहिये. मेरी पत्नी ने यह भी कहा कि पति पत्नि के रिश्ते के बारे में इस तरह का एकतरफ़ा निर्णय लेना ठीक नहीं, जो भी बात हो दोनो को मिल कर निर्धारित करनी चाहिये, नहीं तो पत्नि विवाह के बाहर भी उस कमी को भर सकती है.

अगर हमारे समाज में सेक्स और आँतरिकता के बारे में बात करना बहुत कठिन है तो यह बात हमारे मेडिकल कालिजों पर भी उतनी ही लागू होती है. जब मेरे मेडिकल कालिज में एनाटमी यानि शरीर विज्ञान की पढ़ायी के दौरान नर और नारी गुप्त अँगों की बारी आयी तो हमारे प्रोफेसर साहब ने मुस्करा कर टाल दिया. कक्षा में बोले कि यह हिस्सा अपने आप पढ़ लेना. न ही फिज़ीयोलोजी में सामान्य सेक्स सम्बन्ध क्या होते हैं के बारे में कुछ पढ़ाया या बताया गया. जब कुछ सालों के बाद बीमारियों के बारे में पढ़ाया गया तो गोनोरिया या सिफलिस जैसे गुप्त अंगो के रोगों का इलाज किन दवाओं से किया जाना चाहिये, यह तो पढ़ाया गया लेकिन नर नारी के बीच सेक्स सम्बन्ध में क्या कठिनाईयाँ हो सकती हैं और उनका इलाज कैसे किया जाये, इसकी कभी कोई बात नहीं हुई. फैमिली प्लेनिँग यानि परिवार नियोजन क्या होता है यह अवश्य कुछ पढ़ाया गया लेकिन हस्त मैथुन के क्या प्रभाव होते हैं, या कण्डोम का सही प्रयोग कैसे करना चाहिये जैसी बातों के बारे में कुछ नहीं बताया गया था.

कहने का अर्थ यह है कि मेडिकल कालेज से मेरी तरह के निकले आम डाक्टरों को यह सब कुछ पता नहीं होता कि सेक्स क्या होता है और पति पत्नि की सेक्स इच्छाओं में क्या भेद होते हैं, उन्हें किस तरह की सलाह देनी चाहिये! बस उतना ही मालूम होता है, जो अन्य लोगों को होता हैं, या जितना किसी किताब या पत्रिका में लिखा मिल जाये, वह भी तब जब वह इस विषय पर स्वयं कुछ खोज करें. यह तो आज को नवयुवक डाक्टर ही बता सकते हैं कि क्या इस विषय में आज के हमारे मेडिकल कालेज बदले हैं या नहीं? आज सेक्स के बारे में इंटरनेट पर इतना कुछ भरा है कि सारा जीवन देखते पढ़ते रह सकते हैं, लेकिन यह सब सेक्स को खरीदने बेचने के कारोबार जैसा है, इससे लोगों को सेक्स के बारे में क्या सही सलाह दी जाये, यह समझना उतना आसान नहीं.

हमारे समाज में आम सोच भी है कि लड़कों और पुरुषों को सेक्स की भूख होती है, जबकि लड़कियाँ और नारियाँ इसे केवल सहती हैं. यानि इस सोच में नारी की यौनिकता को नकार दिया जाता है या पुरुष यौनिकता से कमज़ोर माना जाता है. यह सोच भी है कि विवाह के बाहर सेक्स से लड़की की इज़्ज़त लुट जाती है या, कोमार्य उनका सर्वोच्च धन है जिसे उन्हें सम्भाल के रखना चाहिये. पुरुषों को इस तरह की सलाह नहीं दी जाती, बल्कि उनके लिए सलाह होती हैं कि अगर किसी से सम्बन्ध करने हैं तो कण्डोम का प्रयोग करो जिससे अनचाहे बच्चे या गुप्त रोग न हों.

इसी तरह के विचारों की बुनियाद पर ही भारत, पाकिस्तान, बँगलादेश जैसे देशों के पाराम्परिक समाज में लोग, "नारी को अकेले घर से बाहर नहीं निकलना चाहिये", "लज्जा करनी चाहिये", "घूँघट करना चाहिये", "बुर्का पहनना चाहिये", जैसी बातें करते है. इन्हीं विचारों की बुनियाद पर ही मध्य पूर्व तथा अफ्रीका के कुछ देशों में बच्चियों तथा नवयुवतियों के गुप्त अँगों को बचपन में काटा जाता है और कभी कभी सिला भी जाता है, ताकि उनकी यौनिकता को मुक्त पनपने का मौका न मिले. इसी तरह की कुछ बात कैथोलिक धर्म में होती है जब सेक्स को केवल प्रजनन का माध्यम माना जाता है और केवल प्रेम के लिए या वैवाहिक आनन्द के लिए सेक्स को, और परिवार नियोजन के उपायों के प्रयोग को, जीवन के विरुद्ध मान कर अस्वीकार किया जाता है.

लेकिन आर्थिक विकास के साथ पिछले दशकों में एक अन्य बदलाव आया है. आधुनिक लड़कियाँ और युवतियाँ जानती हैं कि कैसे परिवार नियोजन के उपायों के सहारे गर्भ को रोका जा सकता है और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर युवतियों को समाज की स्वीकृति की उतनी परवाह नहीं. इससे नारी यौनिकता को अभिव्यक्ति का मौका पुरुषों के बराबर मिलता है.

बम्बईया फ़िल्मों में भी स्त्री पुरुष सम्बन्धों को अधिकतर पुरुष की दृष्टि से तरह से दिखाया जाता रहा है जिसमें पुरुष यौन सम्बन्ध चाहता है और "रूप तेरा मस्ताना" गा कर अपनी इच्छा को स्पष्ट कहता है जबकि नारी शरमाती हिचकिचाती है. लेकिन बदलते समाज के साथ नारी यौनिकता को भी मुम्बई फ़िल्मों में कुछ स्वीकृति मिलने लगी है.

मेरे विचार में भारत की आधुनिक अभिनेत्रियों में रानी मुखर्जी ने नारी यौनिकता को सबसे मुखर तरीके से व्यक्त किया है. हाल में ही आयी "द डर्टी पिक्चर" और "इश्किया" फ़िल्मों में विद्या बालन ने भी नारी यौनिकता को मुँहफट तरीके से व्यक्त किया था, लेकिन वह अभिव्यक्ति सामान्य जीवन के बाहर के नारी चरित्रों से जुड़ी थी. प्रियँका चोपड़ा ने भी अपनी फ़िल्म "एतराज़" में नारी यौन प्यास को अभिव्यक्त किया लेकिन उसमें उनका चरित्र पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित था. दूसरी ओर रानी मुखर्जी ने "साथिया", "पहेली", "युवा" एवँ "बँटी और बबली" जैसी फ़िल्मों में भारतीय समाज की सामान्य शहरी और गाँवों की नारियों की यौनिकता के विभिन्न रूपों को सुन्दरता से व्यक्त किया है.

Rani Mukherjee - expressing female sexuality

"अईय्या" के गाने में रानी मुखर्जी का पात्र अपने मनभाये पुरुष के पेट पर उभरे सिक्स पैक पर हलके से उँगली फ़िरा कर जताता है कि उसे अपने प्रेमी का शरीर सेक्सी लगता है.

इसी फ़िल्म का एक अन्य गीत "वाट टू डू" भी नारी पात्र की यौन इच्छा और पुरुष पात्र के हिचकिचाने, घबराने को रोचक तरीके से प्रस्तुत करता है. अक्सर लोग इस तरह के गीत को मज़ाक के रूप में देखते हैं कि सचमुच के जीवन में पुरुष नहीं घबराते हिचकिचाते, बल्कि युवतियाँ हिचकिचाती घबराती हैं. लेकिन मेरे अनुभव में जब कोई स्त्री अपनी यौनिकता को सहजता से स्वीकार कर लेती है और आत्मविश्वास के साथ कहती है कि उसे भी सेक्स और आँतरिकता चाहिये, तो अधिकतर पुरुष घबरा और बौखला जाते हैं, उनका आत्म विश्वास आसानी से चरमरा जाता है.

खुल कर अपने मूल्यों पर अपना जीवन जीने वाली युवती को वही पुरुष स्वीकार कर पाता है जिसमें पूरा आत्मविश्वास हो. जिनमें यह आत्मविश्वास कम हो या न हो, वह पाराम्परिक पति परमेश्वर बने रहना चाहते हैं और पाराम्परिक पत्नी चाहते हैं. उन्हें स्वच्छन्द जीवन जीने वाली युवती में समाज और परिवार का विनाश दिखता है और वह उन युवतियों को चरित्रहीन कहते हैं, उन्हें संस्कृति की याद दिलाते हैं, उन्हें शरीर ढकने, लज्जा करने और शालीनता के सबक देते हैं.

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फ्राक पहनने वाले लड़के


आप का दो या तीन साल का बेटा फ्राक पहनने या नेल पालिश लगाने की ज़िद करे या खेलने के लिए गुड़िया चाहे, तो आप क्या करेंगे? और आप कुछ न भी कहें, आप के मन में क्या विचार आयेंगे? अगर पाँच-छहः साल का होने पर भी आप का बच्चा इसी तरह की ज़िद करता रहे तो आप क्या करेंगे?

अगर आप की उसी उम्र की बेटी इसी तरह से पैंट या निकर पहनने की ज़िद करे, लड़कों के साथ मार धाड़ के खेलों में मस्त रहे तो आप क्या सोचेंगे?

आज के समाज में लड़कियाँ का पैंट या जीन्स पहनना आसानी से स्वीकारा जाने लगा है. शायद ही ऐसा कोई काम बचा हो जिसे केवल लड़कों का काम कहा जाता हो. डाक्टर, वकील से ले कर पुलिस और मिलेट्री तक हर जगह अब लड़कियाँ मिलती हैं. कोई युवती पुलिस में हो या मिलेट्री में, यह भी स्वीकारा जाता है कि उस युवती का विवाह होगा, बच्चें होगें और परिवार होगा, यह आवश्यक नहीं कि उस युवती को लोग समलैंगिक ही माने.

लेकिन शायद लड़कों के लिए समाज के स्थापित लिंग मूल्यों की परिधि से बाहर निकलना, अभी भी आसान नहीं है. पति घर में झाड़ू या सफ़ाई करे, खाना बनाये या बच्चे का ध्यान रखे, तो अक्सर लोग सोचते हैं कि "बेचारे को कैसी पत्नी मिली!" या फ़िर सोचते हैं कि उसमें पुरुषार्थ की कमी है. लड़के फ्राक पहनना चाहें, मेकअप करना चाहें या गुड़िया से खेलना चाहें, तो तुरंत ही माता पिता दोनो बिगड़ जाते हैं. खेल के मैदान में साथ खेलने वाले साथी और विद्यालय में साथ पढ़ने वाले उसका जीवन दूभर कर देते हैं.

कुछ सप्ताह पहले ऐसे लड़कों और उनके माता पिता के बारे में अमरीकी प्रोफेसर रुथ पाडावर का लिखा, न्यू यार्क टाईमस मेगज़ीन पत्रिका में एक आलेख छपा था.

Cover New York Times Magazine

इस आलेख में उन्होंने बताया है कि कुछ दशक पहले तक लड़कों के इस तरह के व्यवहार को बीमारी के रूप में देखा जाता था. डाक्टरों का कहना था कि इस तरह के व्यवहार को तुरंत न रोका गया तो बच्चा बड़ा हो कर समलैंगिक बनेगा, नारी बन कर जीना चाहेगा. इसलिए तब इन लड़को को जबरदस्ती "लड़कों जैसे रहो और बनो" के लिए मजबूर किया जाता था. आज इस बारे में डाक्टरों और मनोवैज्ञानिकों की सोच बदल रही है.

आलेख पढ़ते हुए मुझे अंग्रेजी फ़िल्म "बिल्ली एलियट" (Billy Elliot) याद आ गयी जिसमें खान में काम करने वाले मजदूर पिता के बेटे की कहानी थी जो नृत्य सीखना चाहता है और उसके पिता को यह जान कर बहुत धक्का लगता है.

मेरी एक इतालवी मित्र जो पहले पुरुष थी और जिसने लिंग बदलवा कर नारी बनने का आपरेशन करवाया था, मैंने उसके विषय में एक बार इस ब्लाग पर लिखा था. एक बार उसने मुझे बताया था कि उसके छोटेपन में उसके लिए सबसे अधिक कठिन था अपने परिवार की शर्म को स्वीकार करना, "अगर तुम युवक हो और युवतियों के कपड़े पहनो, युवतियों जैसा व्यवहार करो, तो दुनिया तुम्हारा तिरस्कार करती है. तुम्हारे साथ के मित्र तुम्हारे साथ नहीं दिखना चाहते, सोचते हैं कि तुम्हारे साथ रहने से लोग उनके बारे में भी गलत सोचेंगे. कुछ तथाकथित मित्र इतनी क्रूर बातें करते हैं और कहते हैं कि तुम्हारा दिल टूट जाता है. तुम कोशिश करते हो कि इसको छुपा कर रखो. घर में माता पिता, इसे मान भी लें, वे कहते हैं कि घर के अन्दर जैसा चाहो वैसे रह लो, पर घर से बाहर लड़कों जैसे रहो, नहीं तो लोग हमारा मज़ाक उड़ायेंगे, हमारा जीना दूभर हो जायेगा."

करीब एक दशक पहले मैंने यौन पहचान, व्यक्तित्व और यौनिक इच्छा विषय पर शौध किया था. उस शौध के दौरान, एक युवक ने इससे कुछ कुछ विपरीत समस्या बतायी थी. वह विवाहित था और उसके तीन बच्चे थे. उसने बताया था कि "जब मैं छोटा था तो मुझे गुड़िया से खेलना अच्छा लगता था, लड़कियों के कपड़े पहनना चाहता था. कुछ बड़ा हुआ तो लड़कियों के कपड़े पहनने की इच्छा अपने आप लुप्त हो गयी, लेकिन मेरे शौक लड़कियों जैसे थे. मुझे प्रेम कहानियाँ पढ़ना, घर में खाना बनाना, कढ़ायी बुनायी करना अच्छा लगता था. आज भी मेरे वही शौक हैं. मेरे साथी मित्रों में कुछ अपेक्षा सी हो गयी कि मैं समलैंगिक हूँ. सब यही कहते थे कि मैं ऐसा हूँ तो अवश्य समलैंगिक होऊँगा. मैंने कुछ समलैंगिक सम्बन्ध भी किये, पर कुछ मज़ा नहीं आया, मुझे लड़कों से गहरी दोस्ती पसंद थी लेकिन मुझे लड़कों के साथ सेक्स में वह आनन्द नहीं मिला जो लड़कियों के साथ सेक्स में मिला. मेरे कुछ समलैंगिक मित्र कहते थे कि मैं भीतर से समलैंगिक हूँ लेकिन मैं उसे स्वीकारना नहीं चाहता. मेरे विचार में किसी पर यह ज़ोर नहीं होना चाहिये कि अगर किसी के शौक लड़कियों जैसे हैं तो उसे समलैंगिक ही होना चाहिये."

अपने शौध की वजह से मेरी सोच और समझ में बहुत अन्तर आया था लेकिन यह भी सच है कि मैं अपने भीतर इमानदारी से देखूँ तो जानता हूँ कि मन में गहरे मूल्य आसानी से नहीं बदलते. हाँ इतनी समझ आ गयी है कि मानव की यौन पहचान और यौनता को आसानी से श्रेणियों में बाँटा नहीं जा सकता.

रूथ ने अपने आलेख लिखने के बारे में एक ब्लाग में बताया है कि आज के बहुत से माता पिता जब यह जान जाते हैं कि उनका बेटा लड़कियों जैसे कपड़े पहनना चाहता है या गुड़िया से खेलना चाहता है तो वह उन बच्चों पर कोई ज़बरदस्ती नहीं करना चाहते, वह चाहते हैं कि बच्चा अपनी प्रकृति के अनुसार ही व्यवहार करे और बड़ा हो. पर ऐसा करना आसान नहीं क्योंकि समाज का, साथ के अन्य बच्चों का व्यवहार उनसे कहते है कि उनके बच्चे में कुछ खराबी है. इसलिए इस तरह के कई माता पिता ने इंटरनेट के माध्यम से एक दूसरे को सहारा देने के लिए फोरम बनाये हैं, ब्लाग बनाये हैं.

रुथ का शौध बताता है कि सात से दस प्रतिशत लड़कों में इस तरह की बात किसी हद तक हो सकती है, किसी में कुछ कम, किसी में अधिक.

आजकल डाक्टर तथा मनोवैज्ञानिक भी इसे बीमारी नहीं मानते और कहते हैं कि बच्चो को अपने व्यक्तित्व का विकास जिस दिशा में करना चाहे वैसा करने की छूट होनी चाहिये. इस शौध के अनुसार करीब दस वर्ष के होते होते, यह लड़के इस तरह के कपड़े पहनना या व्यवहार करना बन्द कर देते हैं.

बड़े होने पर, उनमें से करीब साठ प्रतिशत युवक समलैंगिक हो सकते  हैं और करीब चालिस प्रतिशत विषमलैंगिक. लेकिन यह शौध यह भी बताता है कि घर वालों तथा माता पिता का सहारा मिलने पर भी, समाज और स्कूल में इन बच्चों पर उनके हम उम्र बच्चों के दबाव रहता है जो कि मान्य लैंगिक मूल्यों के बाहर वाले बच्चों को नहीं स्वीकारते.

आप रुथ का आलेख न्यू योर्क टाईमस पत्रिका पर पढ़ सकते हैं और आलेख लिखने के बारे में रुथ का साक्षात्कार इस ब्लाग पर  पढ़ सकते हैं.

भारत में अगर इस तरह के बच्चे हों तो उनके माता पिता को सलाह और सहारा देने के कोई माध्यम हैं? अगर आप को इसके बारे में जानकारी हो, तो मुझे अवश्य बताईयेगा.

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यौन उदासीनता

जब "यौन उदासीन" लोगों के संगठन के बारे में सुना तो कुछ आश्चर्य सा हुआ. काफ़ी समय से मुझे यौन विषयों में दिलचस्पी है और इस क्षेत्र में कुछ शौध कार्य भी कर चुका हूँ, इसलिए सोचता था कि इस क्षेत्र की हर छोटी बड़ी बात की कुछ न कुछ जानकारी मुझे है, लेकिन जन्मगत यौन उदासीनता की बात भी हो सकती है, यह नहीं सोचा था.

Sexuality - graphic design by S. Deepak

लड़कपन में जब यौन इच्छाएँ जागती हैं तो किशोर किशोरियों के लिए सेक्स से जुड़े बहुत से प्रश्न बहुत अहम हो जाते हैं. उस समय यह सोचना कि कभी ऐसा समय भी आ सकता है जब यौन सम्बन्धों के लिए साथी के होते हुए भी यौन इच्छा नहीं हो, कुछ अविश्वासनीय सा लगता है. आजकल एक नयी हिन्दी फ़िल्म का विज्ञापन आता है, जिसमें तीन लड़के आपस में बात करते हैं और एक कहता है कि अक्सर लड़कियाँ कहती हैं कि "अभी मेरा मन नहीं तो कभी कभी पुरुष भी यही कह सकता है कि सेक्स के लिए उसका मन नहीं", तो दूसरा लड़का आश्चर्य से कहता है, "कोई आदमी कहे कि उसका सेक्स का मन नहीं, क्या ऐसा सचमुच हो सकता है?" यानि उनका सोचना है कि पुरुषों को तो हमेशा सेक्स की चाह रहती है. लेकिन अगर आप विवाहित हों या किसी लम्बे समय से आत्मीय रिश्ते से जुड़े हों तो अवश्य ऐसे मौकों से गुज़रे होगें जब यौन सम्बन्धों की इच्छा न हो. और अगर अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ तो भविष्य में हो सकता है.

आज कल की भागती दौड़ती दुनिया में, भागम भाग का टेंशन, काम का टेंशन या किसी अन्य बात की चिंता या जल्दबाज़ी, यौनिक आत्मीयता की नाजुक इच्छा अक्सर खो जाती है. इंटरनेट और डीवीडी पर वयस्कों के लिए कामुक साहित्य और फ़िल्में (पोर्नोग्राफ़ी) आज बहुत आसानी से उपलब्ध हैं. कुछ लोग इनका प्रयोग अपनी खोयी हुई यौन इच्छा को जगाने के लिए भी करते हैं, लेकिन इसका अधिक प्रयोग भी यौन उदासीनता का बड़ा कारण है. इसलिए यौन उदासीनता के उपचार के लिए कामुक साहित्य, फ़िल्मों और यौन सम्बन्धों से कुछ दिन का उपवास लेने की सलाह दी जाती है.

कुछ लोग सब कुछ जान कर और सोच कर यौन सम्बन्ध न बनाने यानि ब्रह्मचर्य का व्रत लेते हैं, जैसे कि कैथोलिक पादरी या हिन्दू आध्यात्मिक गुरु. इस तरह के ब्रह्मचर्य का पालन करना आसान नहीं. भारतीय मनोवैज्ञानिक और सुप्रसिद्ध लेखक सुधीर कक्कड़ ने अपनी पुस्तक "मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक" (The psychoanalyst and the mystic) में लिखा है कि "गुरु होने का खतरा यह है कि उनका भक्त उन्हें अपने माता पिता के समान रूप में देखना है. इस खतरे की गुरु को समझ होनी चाहिये." उनका कहना है कि यह बात केवल धार्मिक गुरुओं के लिए नहीं, मनोवैज्ञानिकों और चिकित्सकों के लिए भी लागू होती है. लेकिन जिस तरह से और जितने अधिक लोगों की, और जितने लम्बे समय के लिए, धार्मिक गुरुओं के प्रति इस तरह की भावनाएँ होती है, उससे गुरु के पथभ्रष्ट होने का खतरा अधिक होता है. भक्तों की बातें सुन सुन कर, वह स्वयं को सर्वशक्तिमान, सामान्य मानव से ऊँचा समझने लगते हैं. इसका एक नतीज़ा यह भी होता है कि वे यौनिक दोषों में गिर जाते हैं. 70 साल के गुरु जो छुप कर अपनी जवान भक्तिनियों को निर्वस्त्र देखते हैं या बुढ़ापे में भी कई स्त्रियों से सम्बन्ध बनाते हैं, इस तरह के इनके बहुत से उदाहरण मिलते ही रहते हैं.

जन्मगत यौन उदासीनता की बात करने वाले जानबूझ कर ब्रह्मचर्य जैसा कोई निर्णय नहीं लेते, बल्कि उनका कहना है कि पैदाइश से ही, उनके मन में सेक्स सम्बन्धों के प्रति कोई आकर्षण नहीं होता. इतालवी यौन उदासीन संगठन के 28 वर्षीय अध्यक्ष एमानूऐले का कहना है कि उनके कई युवतियों से प्रेम सम्बन्ध हुए हैं. उन्हें भावनात्मक प्रेम में विश्वास है, शारीरिक प्रेम में नहीं. उन्हें चुम्बन या प्यार से गले लगना अच्छा लगता है लेकिन वह सेक्स सम्बन्ध की कोई इच्छा मन में महसूस नहीं करते और न ही अभी तक यह सम्बन्ध उन्होंने किसी से बनाये. उनका कहना है कि उनके प्रजनन अंगों में कोई दोष नहीं और अगर चाहें तो सेक्स सम्बन्ध बना सकते हैं, लेकिन वह नहीं चाहते.

यह पूछने पर कि अगर आप सम्भोग नहीं चाहते पर आप की प्रेयसी चाहती हो या आप परिवार बनाना चाहते हों, तो एमानूऐले कहते हैं कि विषेश परिस्थितियों में वह सम्भोग कर सकते हैं, पर आप तौर पर वह इसके बिना ही रहना चाहेंगे.

पर मैं सोचता हूँ कि अगर एक बार सेक्स का आनन्द ले लें तो शायद उनकी यौन उदासीनता ही समाप्त हो जाये?

क्या यौन उदासीनता को भी अंतरलैंगिकता, समलैंगिकता या द्विलैंगिकता की तरह, यौन विभिन्नता का हिस्सा समझना चाहिये? शायद मनोवैज्ञानिक इसे यौन विभिन्नता के रूप में नहीं देखेंगे बल्कि बीमारी के रूप में देंखें. शायद इनका अवचेतन मन वैसे यौन सम्बन्ध चाहता है जिन्हें सामाजिक स्वीकृति नहीं है और जिनका सामना न करने के लिए यह लोग यौन उदासीन हो जाते हैं?

पर अगर जो लोग इस तरह महसूस करते हैं अगर वह खुश हैं तो किसी और को इसमें परेशानी नहीं होनी चाहिये. इस संगठन का अपना वेबपृष्ठ भी है जिसके करीब तीस हज़ार सदस्य हैं. यह नहीं मालूम कि संगठन में भारतीय सदस्य भी हैं और कितने. इस वेबपृष्ठ पर आप इस तरह के लोगों के बारे में जानकारी पा सकते हैं.

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गालियों की बाढ़

सच्चाई दिखाने के नाम पर अचानक लगता है कि हिन्दी फ़िल्मों में गालियों की बाढ़ आ रही है.

भारतीय लोकजीवन और लोकगीतों में प्रेम और सेक्स की बातों को स्पष्ट कहने की क्षमता बहुत पहले से थी. गाँवों में हुए कुछ विवाहों में औरतों को गालियाँ में और फ़िर दुल्हे तथा उसके मित्रों के साथ होने वाले हँसीमज़ाक में, शर्म की जगह नहीं होती थी. लेकिन साहित्य में इस तरह की बात नहीं होती थी. पिछले दशकों में पहले भारत में अंग्रेज़ी में लिखने वालों के लेखन में, और अब कुछ सालों में हिन्दी में लिखने वालों के लेखन में सच्चाई के नाम पर वह शब्द जगह पाने लगे हैं जिन्हें पहले आप सड़क पर या मित्रों में ही सुनते थे.

यह आलेख इसी बदलते वातावरण के बारे में है. चूँकि बात गालियों की हो रही है, इसलिए इस आलेख में कुछ अभद्र शब्दों का प्रयोग भी किया गया है, जिनसे अगर आप को बुरा लगे तो मैं उसके लिए क्षमा माँगता हूँ. अगर आप को अभद्र भाषा बुरी लगती है तो आप इस आलेख को आगे न ही पढ़ें तो बेहतर है.

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"नो वन किल्लड जेसिका" (No one killed Jessica) फ़िल्म के प्रारम्भ में जब टीवी पत्रकार मीरा हवाई ज़हाज़ में साथ बैठे कुछ बेवकूफ़ी की बात करने वाले सज्जन को चुप कराने के लिए ज़ोर से कहती है, "वहाँ होते तो गाँड फ़ट कर हाथ में आ जाती", तो उन सज्जन के साथ साथ, ज़हाज़ में आगे पीछे बैठे लोगों के मुँह खुले के खुले रह जाते हैं.

ऐसा तो नहीं है कि उन सज्जन ने या ज़हाज़ में बैठे अन्य लोगों ने "गाँड" शब्द पहले नहीं सुना होगा, तो फ़िर शरीर के आम अंग की बात करने वाले इस शब्द के प्रयोग पर इतना अचरज क्यों?

अंग्रेज़ी उपन्यासों या फ़िल्मों में तो इस तरह के शब्द पिछले पचास साठ वर्षों में आम उपयोग किये जाते हैं. हिन्दी फ़िल्मों या साहित्य में कुछ समय पहले तक इनका प्रयोग शायद केवल फुटपाथ पर बिकने वाली किताबों में ही मिल सकता था. 1970 के आसपास, दिल्ली के कुछ युवा साहित्यकारों ने मिल कर एक पतली सी पत्रिका निकाली थी जिसमें सेक्स के विषय पर कविता, कहानियाँ थीं और शायद उसके पीछे, हिन्दी साहित्य में इन विषयों पर बनी चुप्पी से विद्रोह करना था. क्या नाम था उस पत्रिका का, यह याद नहीं, बस उसका पीले रंग का कागज़ याद है. मेरे विचार में उसमें सब लेखक पुरुष थे, और हालाँकि सेक्स क्रिया के वर्णन उस समय के हिसाब से काफ़ी स्पष्ट थे, पर फ़िर भी उसमें लिंग, यौनी जैसे शब्दों तक ही बात रुक गयी थी, सड़क पर बोले जाने वाले आम शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया था.

भारत में अंग्रेज़ी लिखने बोलने वाले वर्ग ने पिछले बीस पच्चीस सालों में सेक्स से जुड़ी बातों और शब्दों की चुप्पी को बहुत समय से तोड़ दिया था. पुरुष लेखक ही नहीं शोभा डे जैसी लेखिकाओं ने भी एक बार लक्ष्मणरेखा को पार किया तो इनकी बाढ़ सी आ गयी. फ़िल्मों में अंगेज़ी की गालियाँ कभी कभार सुनाई देने लगीं. यानि फक (fuck), एसहोल (asshole), कंट (cunt) और प्रिक (prick) जैसे शब्द कहना अश्लीलता या अभद्रता नहीं थी, यह तो जीवन की सच्चाईयों को स्पष्ट भाषा में कहने का साहस था. पर यह साहस यह भी कहता था कि यह शब्द अंग्रेज़ी में ही कहे जा सकते हैं, हिन्दी में इन्हें कहना तब भी अभद्रता ही लगती थी. कुछ समय पहले सुकेतु मेहता की मेक्सिमम सिटी (Maximum city) में बम्बई में आये देश के विभिन्न भागों से आये लोगों की तरह तरह से गालियाँ देने पर पूरा अध्याय था.

1994 की शेखर कपूर की फ़िल्म बैंडिट क्वीन (Bandit Queen) में पहली बार माँ बहन की गालियाँ थीं, जिनसे फ़िल्म देखने वाले लोग कुछ हैरान से रह गये थे. गालियाँ ही नहीं, बलात्कार और यौनता, दोनो विषयों पर फ़िल्म में वह बातें कहने का साहस था, जिनको इतना स्पष्ट पहले कभी नहीं कहा गया था.

Still from Bandit Queen, by Shekhar Kapoor, 1994

अगर बैंडीट क्वीन में बात चम्बल के गाँवों की थी तो देव बेनेगल की 1999 की फ़िल्म, "स्पलिट वाईड ओपन" (Split wide open) का विषय था बम्बई में पानी की कमी के साथ झोपड़पट्टी के रहने वालों के जीवन, उन्हें पानी बेच कर पैसा कमाने वाले गिरोह. कहानी के दो हिस्से थे, पानी बेचने वाले गिरोह के एक युवक की एक नाबालिग लड़की की तलाश जिसे वह अपनी बहन मानता था और टीवी पर जीवन के उन पहलुँओं पर जीवन कहानियाँ सुनाना जो पहले पर्दे के पीछे छुपी रहती थीं. शहर की गालियों की भाषा, नाबालिग बच्चियों से सेक्स की भाषा, और फ़िल्म का संदेश कि पुरुष और औरत के बीच केवल बेचने खरीदने का धँधा होता है चाहे वह विवाह के नाम से हो या रँडीबाजी से, कठोर और मन को धक्का देने वाले लगे थे.

Still from Split wide open, by Dev Benegal, 1999

"बैंडिट क्वीन" या "स्पलिट वाईड ओपन" में हिन्दी फ़िल्मों की रूमानी तवायफ़ नहीं थी जो "साधना" और "राम तेरी गँगा मैली" से हो कर "चमेली" तक आती थी. मेरे विचार में सिनेमा, साहित्य का काम मनोरँजन करना है तो उतना ही आवश्यक, जीवन के सत्य को दिखाना भी है, और यह सच है कि यौनिक हिँसा भी हमारे जीवन का हिस्सा है.

इन फ़िल्मों को कई अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले थे, लेकिन उस समय इसकी भाषा पर आम अखबारों या पत्रिकाओं में कुछ खास बहस हुई हो, यह मुझे याद नहीं, शायद इसलिए कि "बैंडिट क्वीन" और "स्पलिट वाईड ओपन" को अंग्रेज़ी फ़िल्में या फ़िर आर्ट फ़िल्में समझा गया था और हिन्दी सिनेमा देखने वालों को इनके बारे में अधिक मालूम नहीं था.

खैर "अभद्र शब्द" पिछले दस सालों में हिन्दी साहित्य और फ़िल्मों में जगह पाने लगे हैं. "हँस" जैसी साहित्यक पत्रिका में कभी कभार, कहानी में गालियाँ दिख जाती हैं. यह सच भी है कि आप की कहानी में दलित युवक को गुँडे मार रहे हों, मार कर उस पर मूत रहे हों, तो उस समय उसे "हरामी, कुत्ते, मैं तुम्हारी बहन और माँ की इज़्ज़त लूट लूँगा" नहीं कहेंगे, माँ बहन की गालियाँ ही देंगे, तो लेखक क्यों अपनी कहानी को सच्चे शब्दों में नहीं कहे?

पिछले दिनों जयपुर में हुए साहित्य फैस्टीवल में अंग्रेज़ी में लिखने वाले भारतीय मूल के लेखक जीत थायिल (Jeet Thayil) ने अपनी नयी अंगरेज़ी की किताब के कुछ अंश पढ़े. आप चाहें तो इसे वीडियो में देख सकते हैं. इस अंश में वह हिन्दी के दो शब्दों, "चूत" और "चूतिया", का प्रयोग इतनी बार करते हैं कि गिनती करना कठिन है. उनका यह उपन्यास बम्बई में अफ़ीमचियों और नशेबाजों के बारे में है. पर अगर वह संभ्रांत सभा में पढ़े लिखे लोगों के सामने बैठ कर अपने उपन्यास के इस हिस्से को पढ़ते हैं, तो क्यों? मेरे विचार में इसका ध्येय यह भी है कि समाज में इन शब्दों के पीछे छुपे विषयों पर दिखावे और झूठ का पर्दा पड़ा है, और यह लेखक का विद्रोह है कि वह इस दिखावे और झूठ में साझीदारी नहीं करना चाहता.

पर एक अन्य वजह भी हो सकती है, अचानक इस गालियों की बाढ़ की. चाहे ऊपर से कितना बने और कितना कहें कि यह अभद्र है, यह नहीं होना चाहिये, पर इस बात से कौन इन्कार कर सकता है कि सेक्स बिकता है. शोभा डे जैसे लेखकों के लेखन में कितनी कला है और कितना बिकने वाला सेक्स, इसकी बहस से क्या फायदा?

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हिन्दी फ़िल्मों में गालियों के आने से भाषा अनुवाद के प्रश्न भी खड़े हो रहे हैं. कुछ मास पहले मैं फ़िल्म निर्देशक ओनीर की नयी फ़िल्म, "आई एम" (I am) के सबटाईटल का इतालवी अनुवाद कर रहा था. फिल्म में एक हिस्सा है जिसमें एक पुलिसवाला एक समलैंगिक युगल को पकड़ कर उन्हें बहुत गालियाँ देता है. इसका इतालवी अनुवाद करते समय मैं यह सोच रहा था कि माँ बहन की गालियों जैसे शब्दों का किस तरह अनुवाद करना चाहिये? शाब्दिक अनुवाद करुँ या उन शब्दों का प्रयोग करूँ जो इस तरह के मौके पर इतालवी लोग बोलते हैं?

हिन्दी फ़िल्मों के अंग्रेज़ी के सबटाईटल में अक्सर माँ बहन की गालियों का शाब्दिक अनुवाद किया जाता है, पर मुझे लगता है कि वह गलत है, क्योंकि भारत में भी अंग्रेज़ी में गाली देने वाले, अंग्रेज़ तरीके की गालियाँ ही देते हैं, जो हमने अमरीकी फ़िल्मों और किताबों से सीखी हैं, वह हिन्दी गालियों के अंग्रेज़ी अनुवाद नहीं हैं.

अभी हिन्दी समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में इतना साहस नहीं कि वह इस तरह के शब्दों का प्रयोग कर सकें, पर इसके लिए उन्हें अपने आप को सेंसर करना पड़ेगा. कल बर्लिन फ़िल्म फेस्टीवल का प्रारम्भ हुआ. इस वर्ष फेस्टिवल में एक कलकत्ता के फ़िल्मकार की फ़िल्म भी है जिसका नाम है "गाँडू".

फेस्टिवल की निर्देशिका ने एक साक्षात्कार में कहा है कि भारत से आने वाली फ़िल्मों में यह उनकी नज़र में सबसे साहसी और विचारोत्तेजक फ़िल्म है. अगर इस फ़िल्म को पुरस्कार मिलेगा तो हिन्दी के समाचार पत्र और पत्रिकाएँ और टीवी चैनल इस समाचार को किन शब्दों में देगे? फ़िल्म के नाम पर बीप करेंगे? फ़िल्म के विषय और कहानी को कैसे बतायेंगे? और वह फ़िल्म का भारत में सिनेमा हाल पर दिखायी जायेगी, उसके विज्ञापन अखबारों में छपेंगे तो लोग क्या कहेंगे?

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तो आप का क्या विचार है गालियों के इस खुलेपन के बारे में? क्या यह अच्छी बात है? शब्द तो वही पुराने हैं पर साहित्य में, फ़िल्मों में उन्हें इस तरह दिखाना क्या सही है?

एक तरफ़ से मुझे लगता है कि यौनता हमारे जीवन का अभिन्न अंग है लेकिन सब पर्दों के पीछे छुपा हुआ है. यौनता से जुड़ी किसी बात पर खुल कर बात करना कठिन है. इसलिए मुझे लगता है कि अगर इन शब्दों से यौनता के विषय पर बात करना सरल हो जायेगा, यह विषय पर्दे से बाहर आ जायेगा, तो यह अच्छी बात ही है. यह शब्द हमारे जीवन का अंग हैं, गुस्से में गाली देना या वैसे ही आदत से गाली देना, दोनो जीवन का हिस्सा ही हैं और जीवन के यथार्थ को साहित्य, कला और फ़िल्म में दिखाना आवश्यक है.

दूसरी ओर यह भी लगता है कि जीवन में इतनी हिँसा है, यह शब्द, यह गालियाँ भी उसी हिँसा का हिस्सा बन जायेंगी, इनसे साहित्य या फ़िल्म में यथार्थ नहीं आयेगा, बल्कि यथार्थ उसी हिँसा में दब जायेगा.

शायद यह सब बहस इसीलिए है कि अभी हिन्दी साहित्य और फ़िल्मों में इन शब्दों के सामने आने का नयापन है. साठ सालों से अंग्रेज़ी या इतालवी या अन्य भाषाओं के साहित्य और फ़िल्मों से यह नहीं हुआ कि बिना इन शब्दों के साहित्य और फ़िल्म बनना बँद हो गया हो, हर लेखक, निर्देशक अपनी संवेदना और विषय के स्वरूप ही चुनता है कि किन शब्दों में, किस पढ़ने वाले या देखने वाले के लिए अपनी रचना रचे.

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यौन स्वयंसेवक

ब्राज़ील के सन पाओलो फ़िल्म फैस्टिवल में कोरिया के क्योंग दुक छो (Kyong-duk Cho) की फ़िल्म "सेक्स वोलोन्टियर" (यौन स्वयंसेवक - Sex Volunteer) को सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार मिला है. इस फ़िल्म की बात से मुझे "विकलाँगता और यौनता" विषय पर करीब दस साल पहले की गयी, अपने शौध की बात याद आ गयी.


छो कि फ़िल्म का विषय है गर्दन से नीचे पंगु हुए एक टेट्राप्लेजिक छुँकिल नाम के युवक की यौन इच्छा. छुँकिल कवि बनना चाहता है, लेकिन अपनी भावनाओं को काव्य रूप में व्यक्त नहीं कर पाता. जीवन से निराश, छुँकिल सोचता है कि उसकी मृत्यु का समय आ रहा है और एक पादरी को बताता है कि मरने से पहले उसकी एक ही इच्छा है, यौन सम्बंधों के आनंद का एक बार अनुभव करना.

येरी, एक युवती तो सिनेमा की विद्यार्थी है, "यौन स्वयंसेवक" विषय पर फ़िल्म बनाना चाहती है और इसके लिए व्यक्तिगत अनुभव की तलाश में है, छुँकिल के जीवन में आती है.

यह विषय मेरी शौध में भी निकला था जब बात उठी थी कि वह शरीर जिसमें छूओ तो पता नहीं चलता, यौन अंगों और यौन सम्बंधों को सामान्य जिस तरह हम समझते हैं उस तरह उनका महत्व नहीं हो सकता, तो ऐसे में यौनता का क्या अर्थ है?


एक कार दुर्घटना में कमर से नीचे पंगु हुई एक युवती ने इस प्रश्न के उत्तर में अपना एक अनुभव बताया था, जब उन्हें छुँकिल जैसे युवक से प्यार हुआ था. यौन सम्बंधों की प्यास, शरीर की इच्छा के साथ साथ आत्मीयता की भी प्यास है, उसका कहना था, यानि अंग काम करते हैं या नहीं, इसके उपाय खोजे जा सकते हैं, पर पहले यह मानना होगा कि हर मानव को आत्मीयता खोजने का अधिकार है.

इन चर्चाओं में कुछ इस तरह की बातें भी निकली थीं जिन पर शौध में भाग लेने वाले सभी विकलाँग लोग एकमत नहीं थे, जैसे कि विकलाँगों के लिए बने विषेश सेक्स उपकरण.

यौनता से जुड़ी बातों को खुल कर करना कठिन है. विकलाँगता से जुड़ी बातें भी अक्सर दबी छुपी रह जाती हैं. विकलाँग लोगों की यौन इच्छाएँ जैसे विषयों पर दुगने तिगने पर्दे पड़े हैं, उन्हें केवल बीमारियों की दृष्टि से देखा जाता है. छो की फ़िल्म से और उसे मिले पुरस्कार से, अगर इस विषय पर कुछ भी खुल कर बात हो सकती है तो उसका स्वागत है.

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प्रेम के लिए जेहाद

इस बार के बोलिनिया फ़िल्म फेस्टिवल में भारतीय मूल के फ़िल्म निर्देशक परवेज़ शर्मा की फ़िल्म "प्रेम के लिए जेहाद" (Jehad for Love) देखने का मौका मिला. इस फ़िल्म के बारे में पिछले वर्ष के जैंडर बैंडर फ़ैस्टिवल (Gender Bender Film Festival) में सुना था पर तब इसे देख नहीं पाया था. फ़िल्म का विषय है आज के वातावरण में विभिन्न देशों में मुसलमान समुदाय में समलैंगिक होने का अर्थ. फ़िल्म में भारत, मिस्र, दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान, तुर्की, मोरोक्को जैसे देशों से मुसलमान समलैंगिक स्त्रियों तथा पुरुषों की कहानियाँ दिखायीं गयीं हैं. यह अपनी तरह की पहली फ़िल्म है क्योंकि ईस्लाम समलेंगिकता को बिल्कुल स्वीकृति नहीं देता और शारिया की बात की जाये, तो बहुत से परम्परावादी मुसलमान समलैंगकिता की सजा मौत बताते हैं.

यही वजह है कि फ़िल्म में साक्षात्कार देने वाले बहुत से लोग अपनी कहानियाँ तो सुनाते हैं पर अपना चेहरा नहीं दिखाते, हालाँकि सुना है कि 2007 में इस फ़िल्म के प्रदर्शित होने के बाद स्वयं परवेज़ को और फ़िल्म में अपनी कहानी सुनाने वाले कई लोगों को मृत्यु की धमकियाँ मिल चुकी हैं.

दक्षिण अफ्रीकी कहानी है एक समलैंगिक इमाम मुहसिन हैंडरिक्स की, जिनका विवाह हुआ था, दो बेटियाँ भी थीं पर जब उन्होंने पत्नी से तलाक होने के बाद अपनी समलैंगिकता की बात को छुपाने के बजाय खुलेआम स्वीकार किया तो उनके जीवन में तूफ़ान आ गया और उन्हें इमाम के पद से हटा दिया गया. बहुत कोशिशों के बाद उनके शहर के कुछ मुसलमानों ने स्वीकार किया कि वे उन्हें अपनी मस्जिद में इमाम चाहते थे. उनसे बात करने के लिए, बाहर से एक जाने माने करान शरीफ़ के ज्ञानी को बलाया गया, जिनका फैसला बहुत कठोर था, "अगर तुम अपने को नहीं बदल सकते तो समलैंगिकता की सजा मृत्यु दँड है. इस बात पर बहस कर सकते हें कि किस तरह से यह मृत्यु दँड दिया जाये, लेकिन इस बात में कोई शक नहीं कि इसकी सज़ा मृत्यु दँड ही है."

मुहसिन का अपनी बेटियों से बात करने का दृष्य बहुत अच्छा लगा. मुहसिन पूछते हैं, "अगर मुझे पत्थर मार कर जान से मारने की सजा सुनायी जायेगी तो क्या होगा?" उनकी बड़ी बेटी कहती है कि दक्षिण अफ्रीका में इस तरह की सज़ा कोई नहीं दे सकता. उनकी छोटी बेटी कहती है, "पापा, अगर ऐसा होगा तो में चाहुँगी कि तुम पहले पत्थर से ही मर जाओ और तुम्हें तकलीफ़ न हो."

ईरान के कुछ नवयुवकों की कहानियाँ हैं जो कि तुर्की में छुपे हैं और प्रतीक्षा कर रहे हैं कि संयुक्त राष्ट्र संघ का शरणार्थी कमीशन उनकी अर्ज़ी को मान ले और उन्हें कनाडा में जाने की अनुमति मिल जाये. उनके दिन घर वालों, साथियों, मित्रों और प्रेमियों की यादों में कटते हैं जिनको वह अपने गाँवों में छोड़ कर आये हैं, माँ से टेलिफ़ोन से बात करने वाला एक युवक बिलख कर रोता है, उसे मालूम है कि वापस गाँव जा कर वह अपनी माँ को दोबारा कभी नहीं मिल पायेगा क्योंकि उसके नाम पर पुलिस का वारंट है.

कुछ मिलती जुलती कहानी है मिस्र के लड़के की जो कि फ्राँस में शरणार्थी बन कर रह रहा है. मिस्री जेल में अपने बलात्कार के बारे में बताते हुए उसकी भी आँखों में आँसू आ जाते हैं. सबकी बातों में घर परिवार, मित्रों से बुछुड़ने का दर्द भी है और अपनी समाज व्यवस्था पर रोष भी जो उन्हें मानव नहीं मानती.



भारत की कहानियां उत्तरप्रदेश से हैं. एक व्यक्ति बताता है कि वह मक्का की तीर्थ यात्रा कर चुका है और उसने निश्चय किया है वह स्वयं पर कँट्रोल करने की कोशिश करेगा, वह दोबारा से स्त्री वस्त्र नहीं पहनेगा. एक अन्य नवयुवक, जो कि एक इस्लाम के ज्ञानी से अपनी परेशानी की सलाह चाहता है, कहता है, "क्या करें, जब मुसलमान जात में पैदा हुए हैं तो अपनी जात की बात तो माननी ही पड़ेगी." ज्ञानी जी का विचार है कि समलैंगिता गलत है और किसी भी हालत में उसी सही नहीं माना जा सकता, इसलिए उनकी सलाह है कि नवयुवक को स्वयं पर अपने "गलत आदतों" को रोकने के लिए संयम का प्रयोग करना होगा. जब वह नवयुवक ज़िद करता है कि यह बात उसके बस में नहीं, तो ज्ञानी जी कहते हैं कि समलैंगिकता एक बिमारी है जिसका इलाज उन्हें अस्पताल में कराना चाहिये. रात को सब समलैंगिक मित्र छुप कर एक घर में मिलते हैं जब उनमें से कई लोग स्त्री वस्त्र पहनते हैं और "जब प्यार किया तो डरना क्या" पर नाचते हैं.

मिस्र की दूसरी कहानी दो स्त्रियों की है, माहा और मरियम. माहा ने अपनी समलैंगिकता को स्वीकार कर लिया है, जबकि मिरियम को अपराधबोध खा रहा है कि वह अपने धर्म के विरुद्ध जा रही है. "हमें नहीं मिलना चाहिये, हमें खुद को बदलने की कोशिश करनी चाहिये", मिरियम कहती है. माहा अपनी सखी को समझाने के लिए इस्लाम धर्म के बारे में एक किताब खरीद कर लाती है, "देखो, इसमें लिखा है कि अगर मिथुन क्रिया न हो तो वह समलैंगिकता उतनी गम्भीर बात नहीं, इसका मतलब है कि हमारा पाप उतना बड़ा नहीं."



फ़िल्म में बस एक ही खुश जोड़ा है, तुर्की की दो औरतें, फेर्दा और केयमत, जो मसजिद के बाहर भी आपस में मज़ाक करती हैं और छुप कर एक दूसरे को चूम लेती हैं. उनके रिश्ते को पारिवारिक स्वीकृति भी मिली है.

समलैंगिकता किसी धर्म में आसान नहीं, लेकिन इस्लाम से जुड़ी कठिनाईयां अधिक जटिल लगती हैं. फ़िल्म देखने से पहले मुझे नहीं मालूम था कि मुसलमान और समलैंगिक होने में इतनी कठिनाईयाँ है. इस दृष्टि से यह फ़िल्म महत्वपूर्ण है क्योंकि एक दबे छुपे विषय को, जिसका असर विभिन्न देशों के इतने सारे लोगों पर पड़ता है, को खुले में लाती है और उनसे जुड़े प्रश्न उठाती है. फ़िल्म में जिन लोगों की बात उठायी गयी है उन सब के जीवन की कठिनाईयों में मुसलमान समाज का समलैंगिकता के प्रति दृष्टिकोण और सोच का हिस्सा तो है लेकिन साथ ही साथ, उनका स्वयं के बारे में यह सोचना कि वे लोग धर्म के विरुद्ध गलत काम करते हैं, भी एक बड़ी समस्या है.
यानि औरों की सोच बदलने के साथ साथ, इस फ़िल्म के अनुसार, मुस्लिम समलैंगिक लोगों को अपनी सोच को भी बदलने की समस्या है और जब तक वह लोग अपने इस अपराधबोध से नहीं निकल पायेंगे, किस तरह संतोषजनक जीवन बिता सकते हैं? इस बात से मुझे थोड़ा सा आश्चर्य हुआ कि इतने सारे मुस्लिम समलैगिक युवक और युवतियाँ, "उनका धर्म क्या कहता है" वाली बात को इतनी गँभीरता से लेते हैं.

हिंदू धर्म में समलैंगिकता को किसी प्राचीन धार्मिक पुस्तक में गलत कहा गया हो, मुझे नहीं मालूम हालाँकि हिंदू धर्म के रक्षक होने का दावा करने वाले हिंदुत्व वादी कहते हैं कि समलैंगिकता धर्म के विरुद्ध है. बल्कि शिव के अर्धनारीश्वर होने की बात या फ़िर देवी देवताओं के मनचाहने पर पुरुष या स्त्री रूप धारण करना आदि बातों से लगता है कि हिंदू धर्म में मानव के पुरुष रूप और स्त्री रूप की भिन्नता को स्वीकारने की जगह थी. यह सच है कि आज का हिंदू समाज हिँजड़ा कहे जाने वाले लोगों को जिनमें अंतरलैंगिकता, समलैंगिकता के अंश होते हैं, को समाज से बाहर देखता है, लेकिन मैंने नहीं सुना कि कोई कहे कि वे लोग हिंदू धर्म के विरुद्ध हैं. ईसाई धर्म में बाईबल की कुछ बातों को ले कर यह कहा जाता है कि समलैंगिकता अप्राकृतिक है, प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है, गलत है.

मुझे लगता है कि उनके धर्म कुछ भी कहें, परिवार कुछ भी कहें, आज अन्य धर्मों के समलैंगिक लोग अपना जीवन अपनी मर्जी से, स्वतंत्रता से जीने के लिए लड़ते हैं और कई बार अपने धर्म की संकीर्ण तरीके से सोच के विरुद्ध आवाज़ उठाते हैं. लड़कपन में जब अपनी यौनिक पहचान स्पष्ट न बनी हो, उस समय में उनमें अपराधबोध हो सकता है पर समय के साथ वे लोग इस अपराधबोध से निकल जाते हैं और अक्सर धर्म से दूर हो जाते हैं. जबकि फ़िल्म देख कर लगा कि मुस्लिम समलैंगिक लोगों में अपराधबोध से निकलना अधिक कठिन है. मैं सोचता हूँ कि अगर हमारे धर्म में कोई बात मानव अधिकारों के विरुद्ध है तो उसे बदलना चाहिये, जबकि फ़िल्म से लगता है कि इस्लाम में यह नहीं हो सकता क्योंकि कुरान शरीफ़ को बदला नहीं जा सकता.

इस तरह की फ़िल्म बनाने के लिए बहुत साहस चाहिये. परवेज़ को धमकियाँ मिली हैं, उनके विरुद्ध फेसबुक पर पृष्ठ बनाये गये हैं. परवेज़ अपने चिट्ठे पर अपनी लड़ाई के बारे में बताते हैं.

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अश्लीलता के मापदँड

कल की मेरी पोस्ट "लज्जा से गर्व की यात्रा" पर मिली टिप्पणियों के बारे में सारा दिन सोचता रहा. मुझे मालूम है कि इस तरह की पोस्ट पर टिप्पणी लिखना भी साहस का काम है. अपने आप से की उन बातों के बारे में प्रस्तुत है यह मेरा काल्पनिक साक्षात्कार.

प्रश्नः डाक्टर साहब, आप के तो बाल सफेद होने लगे, क्या आप को इस तरह की तस्वीरें लगाते शर्म नहीं आई?
उत्तरः यह तो सफेद होते बालों के दम पर ही तो मैं सेक्स सम्बंधी विषयों पर लिख पाता हूँ. भारत में सामान्य समाज में बड़े होने का अर्थ है कि आप सेक्स से जुड़ी बातों को करने में लज्जाएँ और उन्हे छुपायें. लड़कों में आपस में बैठ कर सम्भोग की या सेक्स की बातें तो की जा सकती हैं पर उसमें भी अपनी लैंगिक पहचान की दुविधाओं की बात करना कठिन है. समलैंगिकता या अंतरलैंगिकता जैसे विषयों पर बात करना और भी कठिन है. "अगर लोग सोचें कि मैं भी वैसा ही हूँ तो क्या होगा?" जैसे डर मन में बैठे होते हैं.

आप सच कहिये, उस पोस्ट को खुल कर पढ़ पायेंगे, उन तस्वीरों को सबके सामने देख पायेंगे? इस तरह के विषयों को चुपचाप, छुप कर ही देखना पड़ता है कि घर वाला या मित्र या साथ काम करने वाला कोई देख न ले और समझे कि मैं भी वैसा ही हूँ? इस विषय पर टिप्पणी देना भी कठिन है क्योंकि उससे सब को मालूम चल जाता है कि मैंने भी वह पोस्ट पढ़ी है.

तो इस दुविधा वाले विषयों पर सफेद बालों वालों के लिए कहना, लिखना अधिक आसान है. शादी हुए सदी बीत गयी, बच्चे बड़े हो गये, अब अगर कोई कुछ सोचे भी तो क्या फर्क पड़ता है. विषय महत्वपूर्ण है, आवश्यक है. मालूम नहीं कि आप के जान पहचान वालों में से, आप के परिवार में से, आप के काम के साथियों मे से कोई समलैंगिक या अंतरलैंगिक है, पर मेरी जान पहचान में ऐसे कई लोग हैं. अधिकतर लोग इस बात को छुपा कर रखते हैं क्योंकि इस बात का ज़ाहिर होना अक्सर नौकरी, घर छोड़ने तक पहुँचा देता है, रिश्ते तोड़ देता है. इसीलिए सोचता हूँ कि विषय महत्वपूर्ण है और इस पर लिखना आवश्यक है.

प्रश्नः शरीर के नंगेपन की अश्लीलता दिखाना, क्या इसमें फूहड़पन और लिजलिजाहट नहीं?

उत्तरः "शरीर की भूख गंदी वासना है. सुंदरता है त्याग और निस्स्वार्थ प्रेम में, दूर दूर से विरह में जलना और परम प्रेम के लिए तड़पना और जीवन त्याग देना. सुंदरता है घुँघट के पीछे से झाँकतीं शर्मीली आँखों में, उड़ते बुर्के के दिखती क्षण भर की झलक में जो दिल में बस जाती है. उससे आगे बढ़ना, शरीर की भूख को स्वीकारना, वासना के सामने झुकना, गलत है और गंदा भी. सच्चा प्रेम तो वही है जो इस शरीर की भूख से ऊपर उठ सके." यह घुट्टी जन्म के साथ ही हमें मिलती है कि प्रेम के अच्छे और बुरे को किस मापदँड से मापा जाये.

बचपन में पढ़े यह पाठ जो अनजाने ही गीतों, कहानियों, फ़िल्मों, बातों से मन में गहरे बस जाते हैं, और दीवारें खड़ी कर देते हैं मन में जिनसे बाहर निकलना कठिन है. लक्ष्मण रेखाएँ खींचते हैं सही और गलत में, विषेशकर स्त्री शरीर के चारों ओर. स्कर्ट पहने वाली, बिना बाजू की पोशाक पहनने वाली, शरीर दिखाने वाली लड़की और युवती जान बूझ कर छेड़ने का निमंत्रण देती है, बलात्कार को स्वयं बुलाती है, यह कहता है यह पाठ. नारी शरीर है ही ऐसा, शैतान का घर, पुरुष मन और वासना को जगाने वाला. छुपा कर रखिये उसे पर्दों में, घृणित है वह अगर खुला हुआ है, उघड़ा है. छुपी हुई, चुपचाप, शाँत और सहनशील नारी ही सुंदर है. यह कहता है हमारा समाज.

पुरुष शरीर पर निर्षेध कम हैं पर समाज से वासना को छुपा कर ही रखना उसका भी कर्त्तव्य है. खुले शर्महीन नारी शरीर को छूना, छेड़ना जायज है पर खुलेआम प्यार में चुम्बन या शरीर की प्यास जताना वासना है, गन्दगी हैं, गलत हैं, वहशीपन है, जानवरों जैसा होना है. पुरुष अन्य पुरुषों को खोजें, इसमें कोई गलत बात नहीं पर सामाजिक परम्पराओं को नहीं छेड़ा जाना चाहिये, यानि उन्हें विवाह करना चाहिये, बच्चे होने चाहिये, और जो भी हो वह चलता रहे तो उसमें कोई बात नहीं. पर अगर पुरुष इन सामाजिक मर्यादाओं को भूल जाते हैं तो उन्हें भी देशनिकाला दिया जाना चाहिये, मृत्युदँड ही देना पड़ेगा. दो स्त्रियाँ आपस में प्रेम खोजें, उनको मार देना जायज हैं, शैतान बसा है उनके शरीरों में. क्या यह नहीं कहता है हमारा समाज?

ऐसी ही कितनी दीवारें खड़ीं हैं मेरे मन में भी. मानव अधिकारों की बात तो ठीक है पर इस तरह खुले आम सबके सामने चुम्मियाँ लेना, नँगे होना, इस सब की क्या आवश्यकता है? अपने घर की चार दीवारी में छुप कर यह नहीं कर सकते हैं क्या? ऐसी बातें फुसफुसाती हैं यह दीवारें मेरे कानों में भी.

मैं नहीं मानता. कोशिश करता हूँ इस फुसफुसाहट को न सुनूँ, कि मन में छुपे इन मापदँडों को चुनौती दे सकूँ, धीरे धीरे बदल सकूँ.

घूँघट के पीछे से झाँकती आँखों की रुमानियत को समझता हूँ, पर यह भी लगता है उसमें पृतसत्ता पर बने समाज के बँधन भी हैं. नँगे शरीरों और स्वच्छंद सेक्स आचरण के खोखलेपन की समझ भी है, पर उस खुलेपन में समस्याओं को ईमानदारी से देखने की शक्ती भी मिल सकती है और किसी को मुखौटों से बाहर निकल कर अपनी नजर से अपना जीवन निभाने का साहस भी मिलता है.

प्रश्नः यानि कि आप को इस तरह की तस्वीरें डालने में कोई गलती नहीं लगती?
उत्तरः गलती लगती है, उन तस्वीरों में छुपी हिँसा भी समझ आती है. जब किसी ने इस तरह की बातों पर कभी खुल कर स्पष्ता से बात न की हो, और उसके सामने इस तरह की तस्वीरें रख दी जायें. इसी लिए तो क्षमा माँग रहा था. पर साथ ही लगता है कि इस विषय पर खुल कर बात करने के लिए कोई दूसरा रास्ता नहीं.

मेरे विचार में आप को उन तस्वीरों को ध्यान से देखना चाहिये, खुद से पूछना चाहिये कि कौन सी तस्वीर में आप को सबसे अधिक परेशानी है और क्यों? अगर दो पुरुषों या दो स्त्रियों के बीच चुम्बन की जगह एक स्त्री पुरुष युगल का चुम्बन होता तो क्या आप उसमें सुंदरता देख पाते? क्या लेसबियन स्त्री के बच्चों की तस्वीर आप को परेशान करती है? क्या नँगे युवक के नितम्ब आप को अश्लील लगते हैं?

प्रकृति में देखो तो पेड़ पौधे, पशु पक्षी यह नहीं सोचते कि वह दुबले या मोटे हैं, उनमें नग्नता है, अश्लीलता है. मानव शरीर भी प्रकृति का ही रुप है. मुझे तो सबमें सुंदरता दिखती है.

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लज्जा से गर्व की यात्रा

28 जून 1969 को न्यू योर्क के ग्रीनविच विलेज में स्थित स्टोनवाल इन्न पर पुलिस ने जब छापा मारा तो उसमें कोई नयी बात नहीं थी. सबको मालूम था कि वह क्लब समलैंगिक लोगों का अड्डा था. सबको यह भी मालूम था कि समलैंगिक लोग अपने बारे में लज्जित होते थे और सामने आने से घबराते थे. पर उस दिन जाने क्यों स्टोनवाल इन्न में एकत्रित लोग पुलिस के सामने भागे नहीं बल्कि उन्होंने लड़ा.

तब से वह दिन याद करने के लिए 28 जून को दुनिया के बहुत से देशों में समलैंगिक और अंतरलैंगिक लोग मोर्चे आयोजित करते हैं. अधिकतर पश्चिमी देशों में आज समलैंगिकता और अंतरलैंगिकता को कानूनी स्वीकृति और अधिकार मिले हैं पर फ़िर भी उनसे भेदभाव या बुरे बर्ताव की कहानियाँ अक्सर सुनने को मिलती हैं. इस मोर्चे का ध्येय यही है, अब तक जीते अधिकारों की खुशी मनाना और अपने विरुद्ध होते अन्यायों के प्रति अपनी आवाज उठाना.

इटली में हमारे शहर बोलोनिया ने सबसे समलैंगिक और अंतरलैंगिक लोगों की इस आवाज़ को सबसे पहले सुना और शहर की समलैंगिक एसोसियेशन को 1982 में आफिस खोलने की जगह दी. कल 28 जून था और समलैंगिक और अंतरलैंगिक गर्व परेड का राष्ट्रीय दिवस बोलोनिया में मनाया गया. इसमें भाग लेने के लिए पूरे देश से हजारों लोग यहाँ आये. इसी परेड की कुछ तस्वीरें प्रस्तुत हैं.

















क्या आप को किसी तस्वीर से धक्का लगा? आशा है कि आप मुझे क्षमा करेंगे.

मैं मानता हूँ कि मानव के प्यार में कोई बुराई नहीं, बुराई है लड़ने झगड़ने, औरों को मारने में, औरों का शोषण करने में. इसीलिए मानव प्रेम के विभिन्न रुपों को दर्शाती इन तस्वीरों में मुझे कुछ गलत नहीं लगता, बल्कि यह सोचता हूँ कि भारतीय चेतना को झँझोड़ने की आवश्यकता है ताकि पुराने और पिछड़े कानूनों को बदला जा सके.

दुनिया के कई देशों में आज भी समलैंगिक या अंतरलैंगिक होने का अर्थ है मृत्यु दँड. भारत में मृत्यु दँड नहीं पर कानूनी अपराध माना जाता है. इसके विरुद्ध बात कीजिये तो कहते हैं कि यह तो सिर्फ कागज़ी कानून है इस पर अमल नहीं किया जाता. अगर यही बात है तो फ़िर उसे बदलने में कठिनाई क्या है? सच बात है कि पुलिस द्वारा इस कानून का सहारा ले कर लोंगो को डराया धमकाया, पीटा जाता है और यही संदेश दिया जाता है कि समलैंगिता या अंतरलैंगिकता अपराध हैं, निन्दनीय हैं, लज्जा से जुड़े हैं, गर्व से नहीं.

शोनेन आइ - नारी कामुक लेखन

अपने घर के पास के पुस्तकालय में किताबें देख रहा था कि एक गुलाबी रंग की छोटी सी किताब पर दृष्टि पड़ी. वेरुस्का सबूक्को द्वारा लिखी इस पुस्तक का शीर्षक है "शोनेन आइ - पूर्व और पश्चिम के बीच नारी कामुकता का कल्पना जगत". शीर्षक देख कर मन में जिज्ञासा जागी तो उसे पढ़ने के लिए ले आया.

बात हो रही है "एरोटिक लेखन" (erotic writing) की. एरोटिक का सही हिंदी में अनुवाद क्या होगा यह मुझे ठीक से नहीं समझ में आया. मैं इसके लिए "कामुक लेखन" का उपयोग कर रहा हूँ. यानी कि वैसा लेखन जिसे पढ़ कर मन में काम भावना का जागरण हो या काम इच्छा को प्रेरणा या उत्साह मिले. काम भावना की बात उठे तो पोर्नोग्राफी का नाम भी लिया जाता है, तो क्या एरोटिक और पोर्नोग्राफी एक ही बात के दो नाम हैं? पश्चिमी लेखन में पोर्नोग्राफी और एरोटिक में अंतर माना जाना है.

पोर्नोग्राफी (pornography) का अर्थ दिया जाता है कि दो या अधिक व्यक्तियों के बीच सेक्स क्रिया की बात करना, चाहे वह लेखन में हो, चाहे तस्वीरों में या फिल्म के रूप में. पोर्नोग्राफी यौन अंगों पर केंद्रित होती है. इस बारे में बात करते हुए "व्यक्ति" शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ क्योंकि यौन सम्बंध नारी और पुरुष के बीच भी हो सकता है, केवल नारियों या केवल पुरुषों के बीच भी. दूसरी ओर, एरोटिक का अर्थ दिया जाता है आपस में आंतरिकता, रिश्ते की बात करना, जिसमें सम्बंध तन का हो या मन का, वह यौन अंगों पर केंद्रित नहीं होता, उसमें दूसरे के प्रति चाह की बात अधिक होती है हालाँकि एरोटिक लेखन में भी सेक्स सम्बंधों की बात कम या अधिक खुले तरीके से हो सकती है.

पर सच कहूँ तो मेरे लिए पोर्नोग्राफी और एरोटिक लेखन का अंतर इतना स्पष्ट नहीं है, कभी कभी लगता है कि अगर साहित्यिक भाषा का उपयोग करें तो उसे एरोटिक बुला लेते हैं और लेखक अच्छा न हो तो उसे पोर्नोग्राफी कह देते हें. या फ़िर सीधे दौ टूक शब्दों में बात की जाये तो वह पोर्नोग्राफी और और उसके बारे में साहित्यिक शब्दों का प्रयोग किया जाये तो एरोटिस्सिम. खैर मुझे लगता है कि इस बहस में किसी निर्णय पर पहुँचना शायद कठिन है.

पुरुष और स्त्री कामुकता में अंतर होता है, यह बात साधारण लग सकती है पर अक्सर मेरे विचार में इसे ठीक से नहीं समझा जाता. कई साल पहले जब मैं "यौन सम्बंध और विकलांगता" विषय पर शौध कर रहा था तो यौन सम्बंधों के बारे में कौन से प्रश्न पूछे जायें यह निर्णय शौध में भाग लेने वालों के साथ ही किया गया था, जिनमें पुरुष भी थे, स्त्रियाँ भी. शौध के सात-आठ महीनों में भाग लेने वाले लोगों से मित्रता के सम्बंध बन गये थे, हम लोग एक दूसरे को जानने लगे थे. तब बात हो रही थी कि शौध के प्रश्न ठीक थे या नहीं, तो स्त्रियों का कहना था कि शौध के यौन सम्बंध पर सभी प्रश्न पुरुष की दृष्टि से थे, उनमें नारी दृष्टि नहीं थी.

पहले तो लगा कि यह बात ठीक नहीं होगी, क्योंकि प्रारम्भ की बहस में, स्त्री और पुरुष दोनो ने भाग लिया था, तो क्यों नारी दृष्टिकोण प्रश्नों में नहीं आ पाया? और दूसरी बात थी कि क्या नारी का यौन सम्बंधों को देखना का नजरिया पुरुष नजरिये से भिन्न होता है, तो क्या भिन्नता होती है उसमें?

बात की गहराई में जाने पर निकला कि प्रारम्भ की बहस में सब लोग नये नये थे, एक दूसरे को ठीक से नहीं जानते थे, और उस समय गुट की स्त्रियों ने, जब प्रश्न निर्धारित किये जा रहे थे तो झिझक की वजह से ठीक से अपने विचार नहीं रखे. उनका यह भी कहना था कि अगर किसी स्त्री ने अपनी बात रखने की कोशिश की भी तो शौध दल के पुरुष उसे ठीक से नहीं समझ सके, क्योंकि पुरुषों का इस बारे में सोचने का तरीका ही भिन्न है. इस बात चीत का निष्कर्ष था कि पुरुष विचारों में प्रेम को यौन सम्बंध से मिला कर देखता है, यौन अंग और सम्भोग पुरुष कामुकता का केन्द्र होते हैं. जबकि नारी विचार रिश्ते की आंतरिकता, उनकी भावनाओं को केन्द्र में रखते हैं, उसमें यौन अंग और सम्भोग के साथ एक दूसरे को करीब से जानना और महसूस करना उतना ही महत्वपूर्ण है.

कुछ समय पहले अर्धसत्य चिट्ठे पर मनीषा जी का एक संदेश पढ़ा था जिसमें उन्होंने लिखा था, ".. अब अपनो से अपनी बात कहना चाहती हूं कि सेक्सुअल लाइफ़ हमारी तो होती ही नहीं है उस आदमी की होती है जिसके शारीरिक संबंध किसी लैंगिक विकलांग के साथ होते होंगे क्योंकि ईश्वर ने मनुष्य के शरीर में अलग-अलग आनंद की अनुभूति के लिये अलग-अलग अंग बनाए हैं लेकिन जब हमारे जैसे लोग एक अंग विशेष से दुर्भाग्यवश वंचित हैं तो हम उस आनंद की अनुभूति कैसे कर सकते हैं? जैसे किसी को जीभ न हो तो उससे कहा जाये कि आप कान से स्वाद का अनुभव करके बताइए कि अमुक पदार्थ का क्या स्वाद है? .." जब यह पढ़ा तो वही बात मन में आयी थी कि क्या मनीषा जी की बात यौनता को पुरुष दृष्टिकोण से देखने का निष्कर्ष है और अगर नारी दृष्टि से देखा जाये तो क्या यौन अंग का होना या न होना ही सब कुछ नहीं? पर यह भी सच है कि इस विषय पर मेरी जानकारी शायद अधूरी ही है और इस तरह की बातें कि "सभी पुरुष ऐसे होते हैं" या "सभी नारियाँ वैसा महसूस करती हैं", जैसी बातें सोचना गलत है, क्योंकि हम सब भिन्न हैं, और हमारे सोचने महसूस करने के तरीकों को पुरुष या नारी होने की परिधियों में बाँधना उसे कम करना है?

खैर बात शुरु की थी वेरुस्का साबूक्को की किताब "शोनेन आइ" से. "शोनेन आइ" (shonen ai) शब्द जापानी भाषा का है, शोनन का अर्थ है लड़का और आइ का अर्थ है प्यार, तो "शानन आइ" का अर्थ हुआ "लड़कों का प्यार". इस पुस्तक में उन्होंने जापान में और अमरीका में नारियों द्वारा नारियों के लिए लिखे जाने वाले कामुक लेखन की बात की है.

इस कामुक लेखन की खासियत है कि वह जाने माने साहित्य, चित्रकथाओं और फ़िल्मों के पुरुष पात्रों को ले कर उनके बारे में समलैंगिक प्रेम कल्पना की संरचना करता है. जापान में इस तरह की कामुक किताबें चित्र कथाओं के रूप में होती हैं जिनके पात्र किशोर या नवयुवक होते हैं, जिनके शरीर एन्ड्रोगाईनस होते हैं, यानि कि वैसे तो पुरुष होते हैं पर उनके हाव भाव नारी रूप के होते हैं.इसके विपरीत है अमरीकी युवतियों द्वारा अन्य युवतियों के लिए लिखे हुए कामुक लेखन, जिसे "स्लेश" (slash) कहा जाता है जिसमें फिल्मों या टेलीविजन के पुरुष पात्रों को ले कर समलैंगिक प्रेम कहानियाँ लिखी जाती हैं. स्लेश लेखन में उम्र में बड़े पुरुष पात्र जैसे स्टार ट्रेक (Star Trek) या एक्स फाईलस (X files) जैसी टेलिविजन सीरियल के पुरुष पात्रों को ले कर लिखी गयीं कहानियाँ. स्लेश लेखन में स्त्री पात्रों को ले कर भी कुछ समलैंगिक कल्पनाओं का लेखन है पर यह अधिक महत्वपूर्ण नहीं है.

शोनेन आइ और स्लेश लेखनों में कामुकता का नारी दृष्टिकोण मिलता है यानि यौन अंगों या सम्भोग की बात कम होती है, पात्रों के आपस में प्यार, उनकी भावनाओं की बात अधिक होती है. पर स्त्रियों को पुरुष समलैंगिक सम्बंध में क्यों या कैसे कामुकता मिली यह मैं ठीक से नहीं समझ पाया. यह तो पढ़ा था कि कई पुरुष नारी समलैंगिक सम्बंधों के बारे में पढ़ना या देखना पसंद करते हैं और इस तरह के दृष्य पोर्नोग्राफिक फिल्मों में दिखाये जाते है.

खैर कोई क्या महसूस करता है, क्यों करता है, यह सब शायद समझने की कोशिश करना समय बरबाद करना है. जब यौनता की बात होती है तो अक्सर विषमलैंगिक, समलैंगिक, आदि शब्दों पर रुक जाती है, पर यह शब्द कैदखाने जैसे हैं जिनमें पूरी मानव जाति को बन्द करने की कोशिश करने की कोशिश करना गलत है.

अगर सोनेन आइ या स्लेश के बारे में अधिक जानना चाहते हें तो इन्हें गूगल पर खोजिये, बहुत सामग्री मिल जायेगी.

नीली गोली की वर्षगाँठ

इन दिनों बात हो रही है अमरीका और कुछ अन्य देशों द्वारा ईराक में किये गये हमले की पाँचवीं वर्षगाँठ की. हमला करने के जो भी कारण बताये गये थे कि ईराक के अल कायदा से सम्बंध हैं या कि ईराक में परमाणू शस्त्र हैं, आदि सब झूठे साबित हुए हैं. फ़िर कहा गया कि यह ईराक में तानाशाह सद्दाम हुसैन को हटा कर वहाँ प्रजातंत्र लाने के लिए किया गया. विश्व स्वास्थ्य संघ के अनुसार इन पाँच सालों में कम से कम एक लाख साठ हज़ार लोग मरे हैं जबकि ईराक में काम करने वाली कुछ संस्थाओं के हिसाब से मरने वालों की संख्या इससे कई गुना अधिक है. करीब पचास लाख बेघर हो चुके हैं जिनमें से 25 लाख ईराक से भाग कर पड़ोसी देशों में शरणार्थी बन गये हैं.

एक और वर्षगाँठ है इन दिनों, पुरुषों के लिए दी जाने वाली नीली गोली यानि वियाग्रा की, जो कि दस साल पहले बाज़ार में आयी थी. वियाग्रा यानि सिलडेनाफिल साईट्रेट (sildenafil citrate, Viagra) आज की सबसे अधिक बिकने वाली दवाईयों में से है जिन्हें ब्लाकबस्टर दवाईयाँ कहा जाता है. अनुमान लगया जाता है कि इसे बनाने वाली अमरीकी कम्पनी प्फाईज़र (Pfizer) को पिछले दस सालों में इस दवा की वजह से कई सौ करोड़ का फायदा हुआ है.

वियाग्रा का काम है पुरुष लिंग के ईरेक्टाईल डिस्फँक्शन यानि तनने की कमज़ोरी को ठीक करना. गोली का असर 40-45 मिनट के बाद होता है और करीब 6-8 घँटे तक रहता है जिसके दौरान पुरुष सम्भोग करने में सफ़ल हो सकता है. अगर 50 मिलीग्राम की गोली से असर न हो तो 100 मिलीग्राम की गोली ली जा सकती है. खाली पेट या खाने के तीन घँटे बाद लेने से भी गोली का असर बेहतर होता है. गोली के अन्य बुरे प्रभाव विषेश नहीं हैं पर हृदय रोगी या फ़िर रक्तचाप काबू में न हो और बहुत बढ़ा हो तो इसे लेने में कुछ खतरा है.


लिंग ठीक से न तन पाये तो इसका कारण अधिकतर मानसिक होता है पर कई बार इसके भौतिक कारण भी हो सकते हैं जैसे कि प्रोस्टेट से जुड़ी कुछ बिमारियाँ. वियाग्रा का असर दोनो तरह की तकलीफों में होता है. वियाग्रा जैसी एक अन्य गोली है सियालिस (Cialis, Tadalafil) जिसका असर अधिक लम्बे समय तक रहता है. एक नयी दवा लेवित्रा (Levitra, Vardenafil) के टेस्ट चल रहे हैं पर असर में लेवित्रा तथा वियाग्रा में कोई अंतर नहीं दिखता.

लिंग की कमज़ोरी की वजह से सम्भोग न कर पाना, कुछ पुरुषों के लिए जीवन नष्ट हो गया महसूस करना जैसी बात बन सकती है. भारत में रेल यात्रा करें तो किसी शहर के आने से पहले इस बात की इलाज के विज्ञापन दिखते हैं, "विवाहित जीवन में परेशानी, निराश न होईये, हकीम से मिलिये, शर्तिया इलाज". अधिकतर व्यक्तियों में परेशानी भौतिक नहीं बल्कि मानसिक होती है इसलिए हकीम कुछ भी इलाज कर दें, उस का कुछ न कुछ असर हो ही जाता है क्योंकि मन से डर कम हो जाता है. इस मानसिक डर का एक कारण शारीरिक प्रक्रियाँओं से जुड़ी भ्राँतियों से भी है जैसे कि हस्तमैथुन से शरीर में कमजोरी आ जाती है और बाद में लिंग से जुड़ी तकलीफ़े हो सकती हैं. नवजवान इस तरह की बातों में बहुत विश्वास करते हैं, डर और चिंता की वजह से उनका आत्मविश्वास गिर जाता है. इस हालत में वियाग्रा जैसी दवाई का बहुत अच्छा असर होता है.

दिक्कत यह है कि एक बार इस तरह का दवा लेने लगो तो मन में बैठा डर और गहरा हो सकता है और पुरुष यह सोचने लगता है कि बिना दवा के वह सेक्स नहीं कर सकता. दूसरी बात है गोली का गलत फ़ायदा उठाने की जब सेक्स ही जीवन का मूल केंद्र बन जाये. नवयुवक, प्रोढ़ और वृद्धों की सेक्स पार्टियों की बातें भी सुनने में आई हैं जिनमें लोग गोलियों का गलत उपयोग करते हैं. या फ़िर गोली के असर में अपने आप को कामशास्त्र का हीरो समझना.

गोली के गलत प्रयोग से जुड़ा एक नया रोग है जिसे नाम दिया है "टेढ़े कील की बीमारी" का (Bent nail syndrome) . यह बीमारी अक्सर प्रौढ़ पुरुषों में पायी गयी जो किसी जवान लड़की के साथ पत्नी से छुप कर मज़े लेने कहीं होटल में पाये जाते हैं और रात को अस्पताल में एमरजैसीं विभाग में आते हैं. गोली के असर में वह खुद को नवयुवक महसूस करते हैं और कामशास्त्र के किसी टेढ़े मेढ़े आसन लगाने की कोशिश में लिंग की जड़ को गहरा नुक्सान पहुँच जाता है जिसका इलाज है लिंग पर प्लस्तर किया जाये.

इस लिए इस गोली की वजह से तलाक भी हो सकता है!

पुरुष हारमोन टेस्टोस्टिरोन

होरमोन शरीर में उत्पन्न होने वाले उन पदार्थों को कहते हैं जो कि शरीर की किसी ग्रन्थी से बन कर रक्त द्वारा शरीर के विभिन्न भागों में अपना असर दिखाते हैं. शरीर में कई तरह के होरमोन बनते हैं जैसे कि एड्रीनलीन जो दिमाग की एक ग्रन्थी में बनता है और जब मानव डर या गुस्से की भावना को महसूस करे तो शरीर में छोड़ा जाता है जिससे शरीर में रक्त का संचार बढ़ जाता है, दिल की धड़कन बढ़ जाती है, साँसों की तेजी बढ़ जाती है. शरीर में दो होरमोन होते हैं जिनका असर यौन विकास पर पड़ता है, एक होरमोन पुरुष यौन विकास के लिए और दूसरा होरमोन स्त्री गुण विकास के लिए.

टेस्टोस्टिरोन हारमोन पुरुष गुणों को बनाने वाला हारमोन है जो पुरुषों में अण्ड ग्रंथियों में बनता है. आम तौर पर शरीर में दो अण्ड ग्रंथियाँ होती हैं, छोटे अण्डों या गोलियों की तरह, लिंग के नीचे. इन ग्रथियों में लेयडिक के कोष होते हैं जहाँ टेस्टोस्टिरोन बनता है. जब बच्चा किशोरावस्था में पहुँचता है तो शरीर में टेस्टोस्टिरोन का उत्पादन बढ़ जाता है और यह हारमोन शरीर में पुरुष शरीर के गुण बनाता है जैसे कि आवाज का भारी होना, दाढ़ी का बढ़ना, शरीर में बाल निकलना, माँसपेशियों का बढ़ना, यौन अंगों का विकास होना, इत्यादि.

एक वयस्क पुवक की अण्ड ग्रथियाँ प्रतिदिन 5 से 7 मिलीग्राम टेस्टोस्टिरोन बनाती हैं और उसे रक्त में छोड़ती हैं. करीब 98 प्रतिशत हारमोन दो प्रोटीनों के साथ बँध जाता है और हारमोन का प्रमुख प्रभाव 2 प्रतिशत के मुक्त होरमोन से होता है. जिन दो प्रोटीनों से हारमोन बँधता है वह हैं यौन हारमोन बाँधने वाला ग्लोबूलिन यानि सेक्सुअल होरमोन बाईंडिंग ग्लोबूलिन जिससे 60 प्रतिशत होरमोन बँधता है और बाकी का 38 प्रतिशत होरमोन एलबुमिन के प्रोटीन से बँधता है. एलबुमिन से होरमोन का बँधन कुछ कच्चा होता है और आवश्यकता पड़ने पर होरमोन का कुछ हिस्सा मुक्त हो सकता है.

होरमोन का अधिकतर उत्पादन सुबह सात बजे से ग्यारह बजे तक होता है, दिन के साथ साथ हारमोन का उत्पादन कम होता जाता है और शाम होते है अपने न्यूनतम स्तर पर आ जाता है. हारमोन उत्पादन मौसम के साथ भी बदलता है, अक्टूबर के महीने में सबसे अधिक होता है और अप्रैल के महीने में सबसे कम.

जीवन के विभिन्न क्षणों में टेस्टोस्टिरोन का काम भिन्न भिन्न तरीकों से होता है. माँ के गर्भ में इस हारमोन की वजह से भी अगर लड़का है तो उसमें पुरुष यौन अंग बनते हैं. अगर माँ के गर्भ में बच्चे में टेस्टोस्टिरोन कम मिले तो बच्चे में यौन अंगों का विकास ठीक से नहीं हो पाता.

किशोरावस्था में आ कर अगर पुरुष शरीर को सही मात्रा में होरमोन न मिले तो शरीर में पुरुष गुणों का विकास ठीक से नहीं होता. न कद बढ़ता है न दाढ़ी आती है, न आवाज भारी होती है. अण्डग्रँथियों की कुछ बीमारियाँ हो सकती हैं जिनसे वह सही मात्रा में इस होरमोन को नहीं बना पाती. कभी कभी मम्पस यानी कनपेड़ा या गलसुआ की बीमारी भी अण्डग्रंथियों पर असर कर सकती है. इस हालत में किशोर पर मानसिक दबाव पड़ता है और उसके मन में अपनी यौन पहचान के बारे में प्रश्न उठ सकते हैं.

वयस्कों में हारमोन का उत्पादन कम होने से थकान, यौन सम्बंधों के लिए उदासी, यौन सम्बंधों में कठिनाई से ले कर और बहुत से लक्षण दिखते हैं जैसे कि चमड़ी का सूखा होना, शरीर में चर्बी का बढ़ना, आदि. स्ट्रैस, तनाव, हमेशा बैठे बैठे काम करना, व्यायाम न करना, आदि से भी हारमोन के स्तर कम हो जाते हैं.

पर हारमोन कम होना केवल बीमारी नहीं, उम्र के साथ साथ पचास साल की उम्र पार करने पर धीरे धीरे टेस्टोस्टिरोन के स्तर कम होने लगते हैं. जो लोग चुस्त रहते हैं, नियमित व्यायाम करते हैं, उनमें इस कमी का असर कम होता है. जब होरमोन का स्तर कम हो जाये और साथ साथ कुछ शारीरिक लक्षण भी जुड़ जायें तो इसे एन्ड्रोपोज (Andropause) का नाम दिया गया जिसकी तुलना नारियों में होने मीनोपाज (Menopause) से की जाती है जब स्त्री में माहवारी आनी बंद हो जाती है.

एक समय सोचा जाता था कि समलैंगिकता बीमारी है जिसमें पुरुष शरीर में टेस्टोस्टिरोन हारमोन की कमी होती है पर यह बात शौध में सही नहीं निकली. समलैंगिक पुरुष और विषमलैंगिक पुरुषों में टेस्टोस्टिरोन के स्तरों में कोई भेद नहीं पाया गया. शरीर में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा अधिक होने को गँजेंपन से जोड़ा गया है. कई नवयुवक जब कसरत से शरीर की माँसपेशियाँ बढ़ाना चाहते हैं तो वे इसी हारमोन से मिलते जुलते पदार्थों के इन्जेक्शन लगवाते हैं, पर जिसके गलत प्रभाव भी पड़ सकते हैं.

जब शरीर जेल बन जाये

जब बच्चा पैदा होता हो तो आसान लगता है यह बताना कि वह बच्चा लड़का है या लड़की, पर मानव की यौन पहचान (gender identity) का बनना इतना आसान नहीं. बच्चे के कोषों में बंद जीन (Genes) में बच्चे की एक यौन पहचान बंद होती है. बच्चे के भीतरी और बाह्य यौन अंगों (genitals) में एक अन्य यौन पहचान बंद होती है. मानसिक रूप से बच्चे की एक अन्य यौन पहचान होती है, जिससे वह स्वयं को पुरुष या स्त्री महसूस करता है. अधिकतर इन विभिन्न यौन पहचानों में समानता होती है तो बच्चे को अपनी यौन पहचान की वजह से परेशान नहीं होना पड़ता. पर जब इनमें से कोई यौन पहचान का दूसरे से मेल न बैठे तो क्या होता है?

आम लोग इस बात को समलैंगिकता (homosexuality) और विषमलैंगिकता (heterosexuality) के दायरों मे बाँट कर देखते है पर असल में यौन पहचान और यौन सम्बंधों की पसंद दो भिन्न बातें हैं. जीन, यौन अंग और मानसिक रुप में यौन पहचान में मेल खाने वाला पुरुष या स्त्री समलैंगिक या विषमलैंगिक हो सकते हैं. स्वयं को पुरुष या नारी महसूस करना पर अपने से दूसरे लिंग के कपड़े पहनने की इच्छा रखना इस सब से भी भिन्न बात है. इसके बारे में भी लोगों में समझ कम होती है.

जब मानसिक यौन पहचान यौन अंगो से मेल न खाये तो वह व्यक्ति अपने आप को गलत शरीर में कैद पाता है. इस तरह पुरुष शरीर वाले लोग जो मानसिक रूप से स्वयं को स्त्री रुप में महसूस करते हैं अपने पुरुष शरीर को जेल की तरह से महसूस करते हैं. इसी तरह, स्त्री शरीर में स्वयं को पुरुष महसूस करने वाला व्यक्ति भी अपने नारी शरीर को कैद की तरह से महसूस करते हैं. दोनों ही हालातों में सेक्स बदलने की बात हो सकती है.

जब अपने शरीर को कैद की तरह महसूस करना सहन न हो तो शल्यचिकित्सा से सेक्स बदलने की बात की जाती है. कई देशों में कानून इस तरह के सेक्स परिवर्तन को नहीं मानता पर इटली में इस तरह सेक्स बदलने की अनुमति है और ओप्रेशन के बाद यहाँ का कानून आप को नाम बदल कर कानूनी तौर पर लिंग बदलने की स्वतंत्रता देता है. प्लास्टिक सर्जरी से नारी शरीर में पुरुष यौन अंग बनाना और पुरुष शरीर में नारी यौन अंग बनाना, दोनो ही हो सकते हैं, हालाँकि दोनो ओप्रेशन जटिल और कठिन हैं. इस लिए ओप्रेशन से पहले यह पक्का करना कि सचमुच उस व्यक्ति में यौन अंगों और मानसिक यौन पहचान में अंतर है आवश्यक है. इसके लिए कम से कम छह महीने तक व्यक्ति को मनोविज्ञान विषेशज्ञ के द्वारा परखा जाता है, यह जाँचा जाता है कि ओप्रेशन से होने वाली तकलीफ़ और कठिनाईयाँ सहने का उसमें साहस है या नहीं. अगर मनोविज्ञान विषेशज्ञ का निर्णय हो कि हाँ यह व्यक्ति सेक्स बदलाव की लिए उपयुक्त है तो उस व्यक्ति को हारमोन भी दिये जाते हैं, नारी बनने की चाह रखने वाले पुरुष को नारी हारमोन और पुरुष बनने की चाह रखने वाली नारी को पुरुष होरमोन, जिनसे उनके शरीर में बाह्य बदलाव आने लगता है. जैसे पुरुषों में स्तन बढ़ जाते हैं, शरीर के बाल कम हो जाते हैं, चमड़ी अधिक मुलायम हो जाती है और स्त्रियों में आवाज भारी होने लगती है, बाल निकल आते हैं. धीरे धीरे, व्यक्ति को प्रोत्साहित किया जाता है कि वह मानिसक रूप में अपने आप को जिस लिंग का महसूस करता है उसके हिसाब से कपड़े पहने.

पुरुष हो कर नारी कपड़े पहनना या नारी हो कर पुरुष भेष बनाना उतना आसान नहीं जितना आप सोच सकते हैं क्योंकि हारमोन लेने और ओप्रेशन होने के बावजूद लोग पहचान जाते हैं कि वे सामान्य नारी या पुरुष नहीं, और क्रूरता से उनकी हँसी उड़ाते हैं, या उनसे बात नहीं करना चाहते. जो व्यक्ति सेक्स बदलाना चाहता है उसमें इस तरह की स्थितियों का सामना करना साहस चाहिये. यह साहस भी चाहिये कि उनके मित्र, उनके परिवार के लोग शायद इस बात से खुश न हों और उनसे नाता तोड़ लें, तो उसे स्वीकार कर सके. जब यह पक्का हो जाये कि उस व्यक्ति में अपनी यौन पहचान बदल कर जीने का साहस है, वह सब कठिनाईयों से लड़ने के लिए तैयार है तभी ओप्रेशन किया जाता है. पुरुष से नारी बनने का ओप्रेशन कुछ सरल है जबकि नारी से पुरुष बनने का ओप्रेशन कुछ अधिक कठिन है. इस तरह के सेक्स बदले हुए नारी या पुरुष में यौन सम्बंध बनाने की सारी क्षमता होती है, पर न तो नारी बना पुरुष कभी गर्भवती बन सकती है और न ही नारी से पुरुष बनने वाला व्यक्ति में बच्चे पैदा करने के लिए वीर्य हो सकता है.

कुछ साल पहले इस विषय पर एक अमरीकी फ़िल्म आयी थी, ट्राँसअमेरिका (Transmaerica) जिसमें शल्य चिकित्सा से नारी बनने के ओप्रेशन की तैयारी करने वाले पुरुष की बात को संवेदना से दिखाया गया था. इन सब विषयों से जुड़े भारतीय कानून अठहारवीं सदी के विकटोरियन कानून हैं जो मानवता और मानव अधिकारों की बात नहीं करते बल्कि इस द्वंद में फँसे लोगों को अपराधी या बीमारी की दृष्टि से देखते हैं. इसलिए भारत में इस तरह के व्यक्तियों के पास समाज से बाहर जा कर हिँजड़ा बनने या समाज में छुप छुप कर रहने के अलावा दूसरा चारा नहीं.


इतालवी ट्राँससेक्सुअल एसोशियेशन के अनुसार इटली में करीब दस हजार व्यक्ति हैं जो अपने आप को गलत शरीर में बंद कैदी समझते हैं और सेक्स बदलना चाहते हैं. पर इस बात की जाँच करने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति व्यस्क हो क्योंकि किशोरावस्था में अपनी यौन पहचान के बारे में दुविधा होना सामान्य बात है और समय के साथ अधिकाँश किशोर अपनी यौन पहचान को समझ जाते हैं.

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