7 जन॰ 2015

नारी और यौन सुख

पहले भी कई बार सेक्स सम्बँधी विषयों पर लिख चुका हूँ, लेकिन इस विषय पर कुछ भी लिखने की सोचूँ तो हर बार मेरे बचपन में सीखे भद्रता-अभद्रता या शालीनता-अश्लीलता के पाठ हर बार मन में कुछ दुविधा सी कर देते हैं कि क्या इन बातों पर चिट्ठे जैसे माध्यम पर लिखना ठीक होगा? फ़िर सोचता हूँ कि इस विषय पर स्पष्ट सरल भाषा में जानकारी मिलना इतना कठिन है कि भद्रता-अभद्रता की बात सोच कर रुकना गलत होगा.

यौन विषयों पर लिखे मेरे आलेख मेरे चिट्ठे के सबसे अधिक पढ़े जाने वाले आलेखों में से हैं, हालाँकि मेरे विचार में इन पन्नों पर कुछ विषेश शब्दों को खोजते हुए जो लोग गलती से आ जाते हैं शायद उन्हें वह नहीं मिलता जिसकी वे आशा कर रहे होते हैं! दूसरी ओर, मुझे इन विषयों पर नियमित रूप से ईमेल के संदेश भी मिलते रहते हैं. यह संदेश अधिकतर पुरुषों के होते हैं या अंतरलैंगिकता के विषय पर होते हैं, जो मुझसे अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के बारे में सलाह माँगते हैं. तब कुछ हैरानी सी होती है जब नवयुवक यौन सम्बंधों के बारे में पूछते हैं, सोचता हूँ कि इस सदी में जब ईंटरनेट पर इस विषय पर इतनी जानकारी भरी पड़ी है, तो भी यह लोग किस तरह की बातों के बारे में चिन्तित होते रहते हैं!

मेरी समझ में भारतीय नवयुवकों की इस चिन्ता में उस भारतीय पाराम्परिक सोच का बड़ा हाथ है जिसके अनुसार पुरुष का वीर्य सम्भाल कर रखना चाहिये, उसको खोने से उनका पौरुष खो जाता है या कम हो जाता है. पढ़े लिखे, पोस्टग्रेजूएट लोग जब लड़कपन के हस्तमैथुन करने और उसके परिणाम स्वरूप शरीर में आयी कमज़ोरी और होने वाले विवाह के बारे में चिन्ता व्यक्त करते हैं कि अगर वे अपनी पत्नी के साथ यौन सम्बँध बना पाने में असमर्थ हुए तो क्या होगा, तो आश्चर्य होता है. सोचता हूँ कि यह लोग किस दुनिया में रहते हैं, क्या इन्होंने वियाग्रा जैसी गोलियों के बारे में भी नहीं सुना?

वैसे तो मेरे विचार में वियाग्रा का इस तरह का प्रयोग केवल मानसिक ग्रँथियों को छुपाता है. इस सोच की असली वजह इन नवयुवकों की मानसिक चिन्ता और घुट्टी में मिली सोच है कि ब्रह्मचर्य से शरीर तँदरुस्त होता है और हस्तमैथुन उसे कमज़ोर करता है. नवयुवकों में यौन सम्बंधों से जुड़ी बीमारियों के बारे में और कैसे कण्डोम के प्रयोग से कई यौन रोगों से बचा जा सकता है, की जानकारी की भी बहुत कमी है. इंटरनेट पर पोर्नोग्राफ़ी से व ब्लू फ़िल्मों से नर-नारी के बीच के सहज यौन सम्बँधों की समझ के बदले, सेक्स के बारे में एकतरफ़ा बिगड़ी समझ मिलती है जिससे नवयुवक सोचते हैं कि पुरुष के लिँग के आकार से या नारी को पीड़ा देने से या हिँसक यौन सम्बँध बनाने से अच्छा सेक्स होता है.

नारी का शरीर और यौन अंग क्या होते हैं, नारी को यौन सुख किस तरह से मिलता है, या पुरुष और नारी के बीच कैसे एक दूसरे को यौन संतुष्टी दे सकते हैं इसकी समझ अक्सर लोगों को नहीं होती. मेरे विचार में यह बात केवल नौसिखिया नवयुकों की नहीं है, बल्कि अक्सर विवाहित या अनुभवी पुरुषों में भी यह समझ पूरी नहीं होती. दूसरी ओर, स्त्रियों में भी अपने शरीर के बारे में पूरी समझ नहीं होती.

कुछ मास पहले नारी यौन सुख के विषय पर अमरीका के सियेटल के एक अखबार में स्तंभ लिखने वाले डेन सेवेज (Dan Savage) का एक आलेख पढ़ा था जिसमें उन्होंने नारी यौन सुख क्या होता है उसके बारे में बहुत स्पष्ट और दो टूक शब्दों में लिखा था. डेन स्वयं समलैंगिक हैं पर उनके आलेख समलैंगिकता या विषमलैंगिकता के दायरों से बाहर निकल कर, शरीर, यौनता और सेक्स विषयों को बहुत स्पष्ट तरीके से छूते हैं.

नारी यौन सुख के बारे में उन्हें एक पुरुष का पत्र मिला था जिसमें पूछा गया था कि वह सम्भोग द्वारा अपनी प्रेमिका को यौन सुख का चर्म नहीं दे पाता था और उसने डेन से सलाह माँगी थी. अपने आलेख में डेन ने इस प्रश्न का उत्तर दिया था (अंग्रेज़ी के आलेख के कुछ हिस्सों का हिन्दी में मेरा अनुवाद है):

"सम्भोग से पहले तुम्हें नारी शरीर के बारे में जानना चाहिये. अधिकतर औरतों को केवल सम्भोग से यौन सुख का चर्म (ऑरगेज़्म) नहीं मिलता. क्योंकि नारी शरीर में यौन अनुभूति में क्लाइटोरिस (यानि यौनिद्वार के पास का उठा हुआ हिस्सा जो पुरुष लिंग जैसे माँस से बना होता है) का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है जैसे कि पुरुष के यौन सुख में उसके लिंग का सबसे महत्वपूर्ण स्थान होता है. अगर सम्भोग में क्लाटोरिस को सही तरह से अनुभूति नहीं मिलेगी तो नारी को यौन सुख कैसे मिलेगा? क्लाइटोरस यौनी के बाहर होती है, यौनी के अन्दर नहीं. तुम्हारा लिंग कितना भी बड़ा या तना हुआ क्यों न हो, अगर तुमने क्लाइटोरिस को नहीं छुआ तो बात नहीं बनेगी.
कुछ औरतों में क्लाइटोरिस इस कोण पर बना होता है कि सम्भोग के दौरान, उसे अपने आप रगड़न मिलती है, इस तरह से उन्हें केवल सम्भोग से पूरा यौन सुख मिल जाता है. पर अगर उनका क्लाइटोरिस ऐसे कोण वाला नहीं है तो कितनी देर भी सम्भोग करोगे, उन्हें यौन सुख नहीं मिलेगा.
70 प्रतिशत औरतों को सम्भोग के साथ साथ क्लाइटोरिस की अतिरिक्त अनूभूति चाहिये तभी वह यौन सुख के चर्म को अनुभव कर सकती हैं. तुम सोचो कि अगर तुम्हारी प्रेमिका तुम्हारे लिंग को केवल पैर से कभी कभी छू ले, और तुम्हें अन्य कुछ न करने दे तो क्या तुम्हें यौन सुख मिलेगा और क्या तुम इसे स्वीकार करोगे? तो तुम्हारी प्रेमिका इसे क्यों स्वीकारे कि तुम उसको यौन की सबसे अच्छी अनुभूति देने वाले उसके अंग को भूल जाओ?"
क्लाइटोरिस शरीर कें कहाँ पर होती है यह आप विकीपीडिया के पृष्ठ पर चौथे नम्बर की तस्वीर में देख सकते हैं जिसमें 1 नम्बर पर क्लाटोरिस के ऊपर की चमड़ी और 2 नम्बर पर क्लाइटोरिस को दिखाया गया है. 3 नम्बर पर यूरिथ्रा यानि मूत्र द्वार है और 4 नम्बर पर यौनी का द्वार.

हिन्दी के विकीपीडिया पर क्लाइटोरिस के बारे में जानकारी तो है लेकिन उस पृष्ठ पर तस्वीरें नहीं हैं. हिन्दी में क्लाइटोरस को भगशिश्न, भंगाकुर, भगनासा आदि कहते हैं लेकिन शायद इन शब्दों को समझने वाले लोग कम ही होंगे.

इस विषय पर हिन्दी में खोजा तो एक वेबपृष्ठ मिला जिसके अनुसार क्लाइटोरिस की अनुभूति की इच्छा केवल लेस्बियन युवतियों को होती है, इस तरह से इंटरनेट पर कुछ गलत जानकारी भी मिलती है.

अगर आपने यौन विषय पर खुल कर कभी बात नहीं की तो झिकझिकाहट हो सकती है लेकिन मैं मानता हूँ कि यौनसुख मानव जीवन के सबसे अमूल्य अनुभवों में से है, इसलिए अपने शरीर को समझना, अपनी इच्छाओं व आकांक्षाओं को पूरा करना बहुत आवश्यक है!

मेरा व्यक्तिगत विचार है कि पति-पत्नि या प्रेमी-प्रेमिका के बीच में वह सब कुछ जायज़ है जिसे वह दोनो स्वतंत्रता से स्वीकार करते हैं और जिससे उन्हें आनन्द मिलता है. प्रेम और सेक्स में जबरदस्ती की कोई जगह नहीं, अगर कोई बात एक साथी को मान्य नहीं तो उसकी सेक्स में कोई जगह नहीं होनी चाहिये! पर साथ ही मेरा मानना है कि बिना आपसी प्रेम और स्नेह के सेक्स में सुख नहीं केवल खालीपन है, लेकिन शायद इस बारे में मेरे विचार कुछ पुराने तरीके हैं!

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