7 जन॰ 2015

अश्लीलता के मापदँड

ब्राज़ील की जन स्वास्थ्य की पत्रिका "कादेर्नोस दे साउदे पुब्बलिका" (Cadernos de Saùde pùblica) का जुलाई 2006 का अंक आया है. यह सारा अंक ब्राज़ील में किये गये एक विशाल सर्वेक्षण (GRAVAD research project) के बारे में है जिसका विषय है आज की नवजवान पीढ़ी यौन सम्बंधों के बारे में क्या सोचती है और उसका यौन आचरण कैसा है. सर्वेक्षण में विषमलैंगिक और समलैंगिक दोनो पहलुओं को परखा गया है.

आधुनिक यौन सम्बंधों पर सर्वेक्षण के प्रारम्भ का श्रेय किनसे (Kinsey) को दिया जा सकता है जिन्होंने 1938 में करीब 500 लोगों के यौन सम्बंधों की जीवन कथाएँ जमा की और उनके विवेचन से दो रिपोर्ट छापीं - 1948 में छपी रिपोर्ट "पुरुष का यौन आचरण" (Sexual behaviour of human male) और 1953 में छपी रिपोर्ट, "स्त्री का यौन आचरण" (Sexual behaviour of human female). एडस तथा यौन सम्बंधों से फैलने वाले रोगों की वजह से पिछले दशक में ऐसे सर्वेक्षण बहुत से देशों में किये गये हैं जैसे फ्राँस, फिनलैंड, अमरीका, आदि पर मेरे विचार में यह ब्राज़ील का सर्वेक्षण सबसे अधिक गहराई में गया है.

ब्राज़ील में जो भी वैज्ञानिक शोध कार्य होता है, अक्सर बहुतर वैज्ञानिक समाज से छुपा रहता है क्योंकि यह पुर्तगाली भाषा में होता है और बहुत कम काम का अँग्रेज़ी में अनुवाद होता है.

जब पत्रिका आई तो उसे बहुत दिलचस्पी से पढ़ा और मन में आया कि इसके मुख्य परिणामों पर चिट्ठे में लिखना चाहिए. सोचा कि जिस बात पर अँग्रेज़ी जानने वालों को भी नहीं मालूम उस पर हिंदी पढ़नेवालों को बताया जाये तो अच्छा होगा. कल सुबह पत्रिका निकाली और सोचने लगा कि कौन से हिस्से चिट्ठा पढ़ने वालों के लिए रोचक हो सकते हैं तो रुक गया. सोचा कि शायद इसे अँग्रेज़ी वाले चिट्ठे में लिखना बहतर होगा. फ़िर उसे बंद करके रख दिया. रात को सोच रहा था कि ऐसा कैसे हो गया कि जिस बात पर किसी देश में सर्वेक्षण किया गया, नवयुवक और नवयुवियों से प्रश्न पूछे गये, उसे वैज्ञनिक पत्रिका में छापा गया, उसे हिंदी में लिखने में अज़ीब लगता है?

ऐनल यौन सम्बंध (anal sex) और ओरल यौन सम्बंध (oral sex) जैसे शब्दों के लिऐ हिंदी में कोई शालीन या वैज्ञानिक शब्द हैं जिन्हें लिखना अश्लीलता न समझा जाये? और सामान्य भाषा में इन विषयों पर लिखा जाये तो अवश्य ही बहुत से लोगों को बुरा लगेगा. "स्त्रियाँ, बच्चे और परिवार के लोग पढ़ेंगे तो क्या कहेंगे?" जैसे प्रश्न उठ सकते हैं.

सच बात तो यह है कि हिंदी में लिखने के शालीनता-अश्लीलता के ऐसे मापदँड हैं कि सामान्य भाषा में कुछ बातें कहना मुमकिन नहीं है. यौन सम्बंधों पर सामान्य भाषा में कुछ कहने वाली पुस्तकें केवल फुटपाथ पर बिक सकती हैं. मालूम नहीं कि कामसूत्र जैसी पुस्तकें जो कि भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग मानी जाती हैं, अँग्रज़ी में चित्रों के साथ मिल सकती हैं, पर क्या हिंदी की किताबों में दुकानों पर बिकती हैं या सिर्फ़ फुटपाथ पर ही बिक सकती हैं?

व्यक्तिगत रुप से में किसी तरह की सेंसरशिप के विरुद्ध हूँ और आज अगर आप के पास अंतरजाल से जुड़ने का मौका है और अँग्रज़ी आती है तो किसी भी विषय पर कुछ भी पढ़ सकते हैं, तो सेंसरशिप का अर्थ हुआ कि यह बंधन केवल उनके लिऐ है जिनके पास यह दोनो नहीं है. व्यक्तिगत अनुभव से यह भी मालूम है कि दिल्ली जैसे शहरों में XXX व्यस्कों के लिए डीवीडी बेचने वाले बहुत मिल जाते हैं. तो ऐसी सेंसरशिप का क्या औचित्य है?

पर उन सब बातों को छोड़ कर भी लगता है कि ऐसे बंधन जो निर्धारित करें कि क्या कह सकते हैं, क्या नहीं, क्या भाषा को कमजोर नहीं बनाते?

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