7 जन॰ 2015

शरीर की प्यास


रानी मुखर्जी की नयी फ़िल्म "अईय्या" का एक गाना देखा तो एक पुरानी बात याद आ गयी.

करीब 35 वर्ष पहले की बात है, मेरे क्लिनिक में एक महिला आयीं. पचास या बावन की उम्र थी उनकी. उनकी समस्या थी कि उनके पति में आध्यात्म योग का वैराग्य जागा था. वह अपने शरीर पर और इच्छाओं पर संयम रखना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने अपनी पत्नि से शारीरिक सम्बन्ध न रखने का फैसला किया था. उन महिला का कहना था कि वह इस बात से बहुत दुखी थीं और पति का समीप न होना उन्हें बहुत कष्ट देता था. वह बोली, "मेरे शरीर की भी तो प्यास है, मुझे अपने पति से सम्बन्ध चाहिये, उनका सामिप्य चाहिये, मैं क्या करूँ?"

उन महिला के पति मुझे बहुत मानते थे इसलिए वह चाहती थीं कि मैं उनके पति से कहूँ कि वह इस तरह से पत्नी से सब सम्बन्ध न तोड़ें. मैंने उस समय तो उनसे कहा कि हाँ मैं आप के पति से इस विषय में बात करूँगा. लेकिन मन ही मन में कुछ हड़बड़ा गया था.

रात को मैंने अपनी पत्नि से इसके बारे में सलाह माँगी. मेरी पत्नि का कहना था कि नारी जब पति का सामिप्य चाहती है तो बात केवल शारीरिक सम्बन्धों की नहीं है, बल्कि नारी के लिए वह तो इसका केवल एक हिस्सा है. नारी के सामिप्य की चाह में एक अन्य भाग होता है मानसिक सामिप्य का, एक दूसरे को छूने का, यह जताने का और कहने का कि तुम मेरे लिए प्रिय हो. इसलिए मेरी पत्नी के अनुसार मुझे उन महाशय से कहना चाहिये था कि अगर वे अपने आध्यात्मिक व्रत के कारण अपनी पत्नि से शारीरिक सम्बन्ध न भी रखना चाहें, तो कम से कम मानसिक रूप से उन्हें अपनी पत्नि के करीब होना चाहिये. मेरी पत्नी ने यह भी कहा कि पति पत्नि के रिश्ते के बारे में इस तरह का एकतरफ़ा निर्णय लेना ठीक नहीं, जो भी बात हो दोनो को मिल कर निर्धारित करनी चाहिये, नहीं तो पत्नि विवाह के बाहर भी उस कमी को भर सकती है.

अगर हमारे समाज में सेक्स और आँतरिकता के बारे में बात करना बहुत कठिन है तो यह बात हमारे मेडिकल कालिजों पर भी उतनी ही लागू होती है. जब मेरे मेडिकल कालिज में एनाटमी यानि शरीर विज्ञान की पढ़ायी के दौरान नर और नारी गुप्त अँगों की बारी आयी तो हमारे प्रोफेसर साहब ने मुस्करा कर टाल दिया. कक्षा में बोले कि यह हिस्सा अपने आप पढ़ लेना. न ही फिज़ीयोलोजी में सामान्य सेक्स सम्बन्ध क्या होते हैं के बारे में कुछ पढ़ाया या बताया गया. जब कुछ सालों के बाद बीमारियों के बारे में पढ़ाया गया तो गोनोरिया या सिफलिस जैसे गुप्त अंगो के रोगों का इलाज किन दवाओं से किया जाना चाहिये, यह तो पढ़ाया गया लेकिन नर नारी के बीच सेक्स सम्बन्ध में क्या कठिनाईयाँ हो सकती हैं और उनका इलाज कैसे किया जाये, इसकी कभी कोई बात नहीं हुई. फैमिली प्लेनिँग यानि परिवार नियोजन क्या होता है यह अवश्य कुछ पढ़ाया गया लेकिन हस्त मैथुन के क्या प्रभाव होते हैं, या कण्डोम का सही प्रयोग कैसे करना चाहिये जैसी बातों के बारे में कुछ नहीं बताया गया था.

कहने का अर्थ यह है कि मेडिकल कालेज से मेरी तरह के निकले आम डाक्टरों को यह सब कुछ पता नहीं होता कि सेक्स क्या होता है और पति पत्नि की सेक्स इच्छाओं में क्या भेद होते हैं, उन्हें किस तरह की सलाह देनी चाहिये! बस उतना ही मालूम होता है, जो अन्य लोगों को होता हैं, या जितना किसी किताब या पत्रिका में लिखा मिल जाये, वह भी तब जब वह इस विषय पर स्वयं कुछ खोज करें. यह तो आज को नवयुवक डाक्टर ही बता सकते हैं कि क्या इस विषय में आज के हमारे मेडिकल कालेज बदले हैं या नहीं? आज सेक्स के बारे में इंटरनेट पर इतना कुछ भरा है कि सारा जीवन देखते पढ़ते रह सकते हैं, लेकिन यह सब सेक्स को खरीदने बेचने के कारोबार जैसा है, इससे लोगों को सेक्स के बारे में क्या सही सलाह दी जाये, यह समझना उतना आसान नहीं.

हमारे समाज में आम सोच भी है कि लड़कों और पुरुषों को सेक्स की भूख होती है, जबकि लड़कियाँ और नारियाँ इसे केवल सहती हैं. यानि इस सोच में नारी की यौनिकता को नकार दिया जाता है या पुरुष यौनिकता से कमज़ोर माना जाता है. यह सोच भी है कि विवाह के बाहर सेक्स से लड़की की इज़्ज़त लुट जाती है या, कोमार्य उनका सर्वोच्च धन है जिसे उन्हें सम्भाल के रखना चाहिये. पुरुषों को इस तरह की सलाह नहीं दी जाती, बल्कि उनके लिए सलाह होती हैं कि अगर किसी से सम्बन्ध करने हैं तो कण्डोम का प्रयोग करो जिससे अनचाहे बच्चे या गुप्त रोग न हों.

इसी तरह के विचारों की बुनियाद पर ही भारत, पाकिस्तान, बँगलादेश जैसे देशों के पाराम्परिक समाज में लोग, "नारी को अकेले घर से बाहर नहीं निकलना चाहिये", "लज्जा करनी चाहिये", "घूँघट करना चाहिये", "बुर्का पहनना चाहिये", जैसी बातें करते है. इन्हीं विचारों की बुनियाद पर ही मध्य पूर्व तथा अफ्रीका के कुछ देशों में बच्चियों तथा नवयुवतियों के गुप्त अँगों को बचपन में काटा जाता है और कभी कभी सिला भी जाता है, ताकि उनकी यौनिकता को मुक्त पनपने का मौका न मिले. इसी तरह की कुछ बात कैथोलिक धर्म में होती है जब सेक्स को केवल प्रजनन का माध्यम माना जाता है और केवल प्रेम के लिए या वैवाहिक आनन्द के लिए सेक्स को, और परिवार नियोजन के उपायों के प्रयोग को, जीवन के विरुद्ध मान कर अस्वीकार किया जाता है.

लेकिन आर्थिक विकास के साथ पिछले दशकों में एक अन्य बदलाव आया है. आधुनिक लड़कियाँ और युवतियाँ जानती हैं कि कैसे परिवार नियोजन के उपायों के सहारे गर्भ को रोका जा सकता है और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर युवतियों को समाज की स्वीकृति की उतनी परवाह नहीं. इससे नारी यौनिकता को अभिव्यक्ति का मौका पुरुषों के बराबर मिलता है.

बम्बईया फ़िल्मों में भी स्त्री पुरुष सम्बन्धों को अधिकतर पुरुष की दृष्टि से तरह से दिखाया जाता रहा है जिसमें पुरुष यौन सम्बन्ध चाहता है और "रूप तेरा मस्ताना" गा कर अपनी इच्छा को स्पष्ट कहता है जबकि नारी शरमाती हिचकिचाती है. लेकिन बदलते समाज के साथ नारी यौनिकता को भी मुम्बई फ़िल्मों में कुछ स्वीकृति मिलने लगी है.

मेरे विचार में भारत की आधुनिक अभिनेत्रियों में रानी मुखर्जी ने नारी यौनिकता को सबसे मुखर तरीके से व्यक्त किया है. हाल में ही आयी "द डर्टी पिक्चर" और "इश्किया" फ़िल्मों में विद्या बालन ने भी नारी यौनिकता को मुँहफट तरीके से व्यक्त किया था, लेकिन वह अभिव्यक्ति सामान्य जीवन के बाहर के नारी चरित्रों से जुड़ी थी. प्रियँका चोपड़ा ने भी अपनी फ़िल्म "एतराज़" में नारी यौन प्यास को अभिव्यक्त किया लेकिन उसमें उनका चरित्र पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित था. दूसरी ओर रानी मुखर्जी ने "साथिया", "पहेली", "युवा" एवँ "बँटी और बबली" जैसी फ़िल्मों में भारतीय समाज की सामान्य शहरी और गाँवों की नारियों की यौनिकता के विभिन्न रूपों को सुन्दरता से व्यक्त किया है.

Rani Mukherjee - expressing female sexuality

"अईय्या" के गाने में रानी मुखर्जी का पात्र अपने मनभाये पुरुष के पेट पर उभरे सिक्स पैक पर हलके से उँगली फ़िरा कर जताता है कि उसे अपने प्रेमी का शरीर सेक्सी लगता है.

इसी फ़िल्म का एक अन्य गीत "वाट टू डू" भी नारी पात्र की यौन इच्छा और पुरुष पात्र के हिचकिचाने, घबराने को रोचक तरीके से प्रस्तुत करता है. अक्सर लोग इस तरह के गीत को मज़ाक के रूप में देखते हैं कि सचमुच के जीवन में पुरुष नहीं घबराते हिचकिचाते, बल्कि युवतियाँ हिचकिचाती घबराती हैं. लेकिन मेरे अनुभव में जब कोई स्त्री अपनी यौनिकता को सहजता से स्वीकार कर लेती है और आत्मविश्वास के साथ कहती है कि उसे भी सेक्स और आँतरिकता चाहिये, तो अधिकतर पुरुष घबरा और बौखला जाते हैं, उनका आत्म विश्वास आसानी से चरमरा जाता है.

खुल कर अपने मूल्यों पर अपना जीवन जीने वाली युवती को वही पुरुष स्वीकार कर पाता है जिसमें पूरा आत्मविश्वास हो. जिनमें यह आत्मविश्वास कम हो या न हो, वह पाराम्परिक पति परमेश्वर बने रहना चाहते हैं और पाराम्परिक पत्नी चाहते हैं. उन्हें स्वच्छन्द जीवन जीने वाली युवती में समाज और परिवार का विनाश दिखता है और वह उन युवतियों को चरित्रहीन कहते हैं, उन्हें संस्कृति की याद दिलाते हैं, उन्हें शरीर ढकने, लज्जा करने और शालीनता के सबक देते हैं.

***

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें