7 जन॰ 2015

प्राचीन चीनी यौन ज्ञान

यह संदेश यौन समबंधी विषय पर है. अगर आप को इस विषय पर पढ़ना अच्छा नहीं लगता तो आगे नहीं पढ़िये.

मिलाना वूकोविच रुनजिच (Milana Vukovic Runjic) रहती हैं क्रोएशिया की राजधानी ज़्गाब्रिया में और पत्रकार हैं, पुस्तकें भी छापती हैं. साथ ही वह अपने यौन विषयों सम्बंधी साप्ताहिक लेख "सेक्सोपोलिस" (Seksopolis) के लिए भी जानी जाती हैं. यह लेख छपता है "द बिलीवर्स" पत्रिका में. उनके लेख एक इतालवी पत्रिका "इंतरनात्जोनाले" में भी छपते हैं जहाँ मैंने उन्हे पढ़ा.

मिलाना के एक लेख में चीनी यौन विश्वासों के बारे में कुछ नयी जानकारी मिली (कम से कम, मेरे लिए तो यह नयी ही है). अगर आप कामशास्त्र जैसे विषयों में दिलचस्पी रखते हैं तो शायद आप यह लेख पूरा पढ़ना पसंद करें. प्रस्तुत हैं इसी लेख के कुछ अंशः

"जितनी अधिक औरतों के साथ एक पुरुष संसर्ग करता है, उसके लिए उतना ही अच्छा है, और अगर कोई पुरुष एक रात में दस औरतों से संसर्ग करे तो वह ज्ञान की राह पर है. ऐसे विश्वास थे 2000 वर्ष पहले के ताओ सोच के, जिसके हिसाब से मानव के लिए सबसे जरुरी बात है प्रकृति के साथ समन्वय और संतुलन बना कर जीना. अगर कोई पुरुष संतुष्ट, दीर्घ और स्वस्थ्य जीवन जीना चाहता है तो उसे अपनी याँग शक्ति को स्त्री की यिन शक्ती से जितना हो सके मिलाना चाहिए...

पुरातन चीन में यौन ज्ञान पर बहुत से पुस्तकें लिखी गयीं जो इस विषय पर विस्तार से, खुल कर बताती थीं. नवविवाहितों के लिए यह पुस्तकें उपहार में दी जातीं थीं, और कोई इन्हें अश्लील या बेहूदा नहीं समझता था. जैसे कि "सोने के कक्ष की पुस्तक" में छह अध्याय थे. जिनमें याँग और यिन के बारे में, अच्छी पत्नि कैसे चुनी जाये, विभिन्न यौन मुद्राओं के तरीके, कैसे संसर्ग सुख को लम्बा खींचा जाये, कैसे गर्भवती स्त्री की देखभाल की जाये, सब बातें थीं इस पुस्तक में...

पुरुष यौन अंग को विभिन्न नामों से पुकारा जाता था जैसे संगयशब का खम्बा, लाल पक्षी, आकाशी परदार साँप, मूँग की ओस, इत्यादि. इसी तरह स्त्री यौन अंग के भी कई नाम थे, जैसे पिओनिआ का फ़ूल, प्रापक कुम्भ, लाल द्वार, इत्यादि. बहुत सी पुस्तकें ध्यान करने और शरीर की मालिश आदि के तरीके भी सिखाती थीं ताकि यौन सुख से शरीर को पूरी संतुष्टी हो और शरीर स्वस्थ्य रहे...

पंद्रह से तीस वर्ष के पुरुषों के लिए यह पुस्तकें प्रतिदिन नयीं स्त्री के साथ संसर्ग की, और लम्बी और भारी स्वर वाली स्त्रियों से दूर रहने की सलाह देती थीं "क्योकि उनकी यिन शक्ति अच्छी नहीं होती". यौन संसर्ग इच्छा कम हो रही तो उसे बढ़ाने के लिए अनेक जड़ी बूटियाँ थीं जिन्हें "गंजी मुर्गी" के नाम से जाना जाता था."
पहली बार जब मिलाना का कोई लेख पढ़ा था तो थोड़ा सा अचरज हुआ था कि इस तरह के लेख एक स्त्री लिखती है. शायद यही आधुनिक भारतीय मानसिकता है कि यौन सम्बंधी बातों को केवल "पुरुष विषय" समझती है ?

प्राचीन चीन की यौन पुस्तकों का जो परिचय इन पुस्तकों से मिलाना के लेख में मिलता है, उनसे तो लगता है कि यह पुस्तकें पुरुष दृष्टिकोण की ओर अधिक ध्यान देती थीं और स्त्री का भाग इनमें केवल पुरुष को संतुष्ट करना लगता है. शायद वात्स्यायन का कामसूत्र इसके मुकाबले स्त्री दृष्टिकोण के प्रति अधिक सजग था ?

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